शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

मोहब्बत किसको कहते हैं


मोहब्बत क्या है, कोई इसे वफा का दूसरा नाम मानता है तो कोई मोहब्बत के नाम पर मर मिटने की बात करता है। मोहब्बत में डूबे दो दिल मर कर भी अमर हो जाते हैं। सदियों से चले आ रहे रिश्तों में सबसे खास रिश्ता है मोहब्बत का जिसे  प्रसिद्ध लेखकों ने अपनी कलम के माध्यम से बेहद खूबसूरती के साथ कागज पर उतारा है। वेलेंटाइन वीक बना है प्यार करने वालों के लिए। इस वीक का हर दिन खास होता है। पेश है इस मौके पर मोहब्बत को जिंदगी मानने वाले मशहूर साहित्यकारों के दिल की बात जो उन्होंने चंद लाइनों में उतारने की कोशिश की है...

प्रसिद्ध कवि और लेखक कुमार अंबुज ने कविता के माध्यम से लोगों को सोचने का नया और वास्तविक नजरिया दिया है। प्रेम के प्रति उनके विचार कुछ इस तरह सामने आते हैं।
निकट पारिवारिक संबंधों केे अलावा बाकी सारे प्रेम दैहिक आकांक्षा से प्रेरित होते हैं।
वैसे हर तरह का प्रेम एक स्थगित अवसाद है।
प्रेम यदि सहचर्य में बदल जाए तो उपलब्धि है।
वह एक अविस्मरणीय अनुभव तो है ही।
प्रेम को प्रस्तुत करने वाली कविता की चंद पंक्तियां वे कुछ इस तरह बताते हैं-
यह सूर्यास्त की तस्वीर है
देखने वाला इसे सूर्योदय भी समझ सकता है
प्रेम के वर्तुल हैं सब तरफ
इनका कोई पहला और आखिरी सिरा नहीं
जहां से थाम लो वही शुरुआत, जहां छोड़ दो वही अंत
रेत की रात के अछोर आकाश में ये तारे
चुंबनों की तरह टिमटिमाते हैं
और आकाशगंगा मादक मद्धिम चीख की तरह
इस छोर से उस छोर तक फैली है
रात के अंतिम पहर में यह किस पक्षी की व्याकुलता है
किस कीड़े की किर्र किर्र चीं चिट
हर कोई इसी जनम में अपना प्रेम चाहता है
कई बार तो बिल्कुल अभी, ठीक इसी क्षण
आविष्कृत हैं इसीलिए सारी चेष्टाएं, संकेत और भाषाएं
चारों तरफ चंचल हवा है वानस्पतिक गंध से भरी
प्रेम की स्मृति में ठहरा पानी चांदनी की तरह चमकता है
और प्यास का वर्तमान पसरा है क्षितिज तक
तारों को देखते हुए आता है याद कि जो छूट गया
जो दूर है, अलभ्य है जो, वह भी प्रेम है
दूरी चीजों को टिमटिमाते नक्षत्रों में बदल देती है॥
गजलों की दुनिया में राहत इंदौरी वो नाम है जिसने फिल्म जगत में अपने गीतों की धूम तो मचाई ही लेकिन शेरों शायरी की दुनिया में भी एक अलग अंदाज से पेश होकर अलग मुकाम बनाया। मुशायरों की शान कहे जाने वाले राहत इंदौरी की नजरों में मोहब्बत जिंदगी है जिसके बिना जिंदगी का तसव्वुर नहीं है। हर मजहब में मोहब्बत को जीवन का आधार इसकी अहमियत को समझते हुए ही बनाया गया है। राहत जिंदगी का अव्वल और आखिर मोहब्बत को ही मानते हैं। उनके कुछ शेर इस तरह हैं-
न जाने कौन सी मजबूरियों का कैदी हो
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफा न कहो।

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यंू है।

नीलेश रघुवंशी की कविताएं गहरे अंधेरे के बीच से रोशनी की तरह बिखरती कविताओं के रूप में पहचानी जाती हैं। प्रेम के प्रति अपने विचार व्यक्त करते हुए नीलेश कहती हैं दो प्रेम करने वालों के बीच आपसी समझ और खुशी होना जरूरी है। प्रेम सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए न हो, बल्कि उसमें दूसरों की खुशी का भी उतना ही ख्याल रखा जाए। इस विषय पर शमशेर बहादुर सिंह की कविता उन्हें प्रभावित करती है-
रूप नहीं मेरे पास
द्रव्य नहीं मेरे पास
फिर भी मैं करता हूं प्यार।
नीलेश रघुवंशी द्वारा लिखित कविता प्रेम का प्रदर्शन इस अंदाज में करती है-
मुझे प्रेम चाहिए घनघोर बारिश सा
कड़कती धूप में, घनी छांव सा
ठिठुरती ठंड में, अलाव सा प्रेम चाहिए
मुझे अलाव सा प्रेम चाहिए, सारी दुनिया रहती हो जिसमें॥
नीलेश के शब्दों में जिस तरह युवा पीढ़ी के लिए वेलेंटाइन डे प्रेम का प्रतीक है उसी तरह हमारे देश में बसंत ऋतु को प्रेम का पर्याय माना जाता है। पे्रम में स्वतंत्रता मायने रखती है। एक-दूसरे को आजादी देते हुए, उस पर विश्वास बनाए रखते हुए परस्पर साथ निभाना सच्चे प्यार की निशानी है। शायरों की नजरों में प्यार के अनेक रूप हैं जो अलग-अलग अंदाज में उनकी कलम से कागज पर उतरते रहते हैं। उर्दू के मशहूर शायर मंजर भोपाली की नजरों में सारी कायनात मोहब्बत के लिए बनी है। वह हर चीज जिसमें रूह है उसे प्यार करने का हक है इसीलिए सिर्फ इंसान ही क्या, बल्कि परिंदे भी प्यार करते हैं। पहले प्यार का रूप अलग था और आज इंटरनेट के दौर में प्यार करने वालों की सोच और अंदाज बदले हैं। इन सबके बीच प्यार का विरोध करने वालों की कोई जगह नहीं होना चाहिए।
दिल के कागज पर आज प्यार लिखे
एक ही लफ्ज बार-बार लिखे
चांदनी इस जमीं पर बिखराएं
आइए प्यार हम भी अपनाएं
आज कांटे बिछाने वालों को
प्यार का हम सबक सिखाएंगे
आओ हम प्यार की कसम खाएं
एक दूजे के आज हो जाएं।
शायरी की दुनिया में एक ऐसा नाम जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। वो है अंजुम रहबर। अंजुम के लफ्जों में मोहब्बत का जिक्र करें तो  बेशक मोहब्बत के  सफर में उतार चढ़ाव आते हैं। जिंदगी बनती या बिगड़ती है। वो जमाना और था जब लोग मोहब्बत के मायने समझते थे। मोहब्बत भरी लाखों चिट्ठियों को प्यार भरे दिल हमेशा संभालकर रखते थे और उन्हेें बार-बार पढ़कर अपने मेहबूब को याद करते थे। आज की पीढ़ी मोहब्बत का इजहार करने के लिए गुलाब देती है, जबकि मेरी नजरों में शाख से गुलाब तोडऩा भी उसका दिल तोडऩा ही है।
फूल उसने भेजे हैं
फूल सूख जाएंगे
साफ ये इशारा है
इंतजार मत करना।
प्यार में मजबूरियों का जिक्र करते हुए अंजुम लिखती हैं
मजबूरियों के नाम पर सब छोडऩा पड़ा
दिल तोडऩा कठिन था।
मगर तोडऩा पड़ा
मेरी पसंद और थी
सबकी पसंद और
इतनी जरा सी बात पर घर छोडऩा पड़ा।
प्यार के नाम पर अंजुम कहती हैं
ये किसी धाम का नहीं होता
ये किसी काम का नहीं होता
प्यार में जब तलक नहीं टूटे
दिल किसी काम का नहीं होता।
प्यार के दुश्मन जमाने में कम नहीं हैं। कभी धर्म के नाम पर तो कभी अमीरी गरीबी के फासले प्यार करने वालों को जुदा कर देते हैं
दफना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का गरीब था।

मिलना था इत्तेफाक बिछडऩा नसीब था
वो इतनी दूर हो गया जितना करीब था।

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014


मैं नास्तिक हूं



मैं धर्म में विश्वास नहीं करता, ईश्वर के अस्तित्व में मेरा यकीन नहीं है और न ही ईश्वर की भक्ति में जीवन समर्पित कर देने से जीवन सार्थक होता है। ये विचार हर उस नास्तिक व्यक्ति के हैं जो ईश्वर के अस्तित्व से इंकार करता है। अगर विश्व स्तर पर बात की जाए तो यहां अनेक धर्मावलंबी रहते हैं। धर्म के नाम पर कुछ भी कर गुजरने की श्रद्धा लोगों में कूट-कूट कर भरी है। ऐसे ही लोगों के बीच में वे भी हैं जो आम लोगों की नजरों में छाए रहते हैं। उन्हें लोग अपनी प्रेरणा मानते हैं और उनके सिद्धांतों पर चलना चाहते हैं। यहां बात हो रही है उन सेलिब्रिटीज की, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते और नास्तिक कहलाते हैं....

दोस्तोएवॉस्की ने कहा था कि अगर ईश्वर नहीं है, तो हमें उसका आविष्कार करना होगा, नहीं तो हर कोई हर कुछ करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा। इस महान रूसी लेखक की मृत्यु के 130 साल बाद भी नास्तिक इससे सहमत नहीं हो पाए हैं। बल्कि पिछले कुछ वर्षों से उनकी गतिविधियां कुछ तेज हुई हैं। इसके पीछे रिचर्ड डॉकिन्स की पुस्तक 'द गॉड डेल्यूजनÓ नाम की अत्यंत पठनीय किताब की भी कुछ भूमिका हो सकती है। यह किताब पहली बार 2006 में प्रकाशित हुई थी और तब से लगातार इंटरनेशनल बेस्टसेलर बनी हुई है। यह ईश्वर के अस्तित्व को आदमी की खामखयाली साबित करने वाली दर्जनों पुस्तकों की सिरमौर है। अलबर्ट आइंस्टीन ने जिस पत्र में ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाया था, उसे बेचे जाने के लिए इंटरनेट पर पेश किया गया है और इसके लिए बोली 30 लाख डॉलर से शुरू हुई है। आइंस्टीन ने वर्ष 1955 में अपनी मौत से एक साल पहले जर्मन भाषा में यह पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने ईश्वर, धर्म और जनजातीयता पर अपने विचार रखे थे। उन्होंने प्रिंसटन विश्वविद्यालय के लेटरहेड पर दार्शनिक एरिक गटकाइन्ड को यह पत्र तब लिखा, जब उन्होंने एरिक की किताब 'चूज लाइफ- द बिबलिकल कॉल टू रिवोल्टÓ पढ़ी। वर्ष 1921 में भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल सम्मान पाने वाले आइंस्टीन के नास्तिक होने का पता उस पत्र से चलता है जिसमें उन्होंने लिखा था कि मेरे लिए 'ईश्वरÓ शब्द इंसानी कमजोरी की अभिव्यक्ति से अधिक कुछ भी नहीं है। गौरतलब है कि 4 लाख 4 हजार डॉलर में बिकने के बाद से इस पत्र की चर्चा जोरों पर रही।
एक एकेडमी, दो स्क्रिन एक्टर्स और तीन गोल्डन ग्लोब्स अवार्ड प्राप्त करने वाली एंजेलिना जोली से एक इंटरव्यू के दौरान जब यह पूछा गया कि क्या ईश्वर है? तो उनका जवाब था वे लोग जो ईश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए वह है लेकिन मुझे ईश्वर की जरूरत नहीं है इसलिए उसका अस्तित्व भी मेरे लिए नहीं है। मैं ईश्वर को नहीं मानती। बीबीसी 2 और चैनल 4 पर नाइजेला लॉसन के कुकिंग शो की प्रसिद्धिा देश-विदेश में है। उनकी किताब हाउ टू ईट और हाउ टू बी ए डोमेस्टिक गॉडेस को पाठकों ने बहुत पसंद किया। उनका कहना है कि मैं खुद को नास्तिक मानती हूं और मुझे इसी रूप में देखा जाता है लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ जब मैंने नैतिकता के सिद्धांतों को नहीं माना हो। मैं सही और गलत को पूरी तरह मानती हूं और यह भी मानती हूं कि मैं जो भी करती हूं उस हर काम के लिए मुझे प्रभु ईशु मसीह की जरूरत है। सिर्फ ईश्वर की भक्ति में जीवन समर्पित कर देने से ज्यादा जरूरी भी कई काम हैं जो किए जाने चाहिए। ये कहना है बिल गेट्स का। उन्हें लगता है कि रोज सुबह पूजा पाठ में लग जाने से ज्यादा जरूरी दुनिया भर के ऐसे काम भी हैं जो पहले करना चाहिए। किसी व्यक्ति के नास्तिक होने का आभास कम उम्र से ही होता है। जॉन अब्राहम जब चार साल के थे तभी अपने पिता के साथ धार्मिक स्थानों पर जाने से मना करते थे। आज भी उन्होंने अध्यात्म को बिना किसी धार्मिक संस्थान के स्वीकार किया है। अमोल पालेकर ने कभी यह नहीं कहा कि वह नास्तिक हैं लेकिन जब भी धर्म से संबंधित बात होती है तो उनका कहना होता है कि वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते।
कुछ सालों पहले मीडिया के सामने जावेद अख्तर ने कहा था कि विश्वास धर्म की बुनियाद है। इस विषय पर आप चर्चा नहीं कर सकते। इसके पीछे कोई तर्क या कारण भी नहीं होता।
विश्वास और मूर्खता में बहुत बड़ा अंतर है। अपने पिता की तरह फरहान अख्तर भी ईश्वर में विश्वास नहीं करते। उन्होंने अपने पिता के साथ बचपन से जो सीखा वही अपनाया भी, शायद इसलिए वे नास्तिक हैं। कुछ सितारों ने अपने काम को ही ईश्वर मान लिया है। इन्हीं में से एक हैं कमल हासन जिनके लिए फिल्में ही धर्म है। वे कहते हैं हर धर्म को अपनाने के लिए उस पर यकीन करने की जरूरत होती है। मेरा यकीन धर्म में नहीं, बल्कि फिल्मों में है। अभिनेता और निर्देशक रजत कपूर के अनुसार ईश्वर सिर्फ लोगों द्वारा बनाई गई धारणा है जिसके फायदे कम और नुकसान ज्यादा है। ईश्वर के नाम पर लोग एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाते हैं और दंगे करते हैं। यह हालात सदियों से बने हुए हैं। मेरा मानना है कि ईश्वर कहीं नहीं है। न स्वर्ग है और न ही नर्क। नास्तिकता के सिद्धांतों को अपनाते हुए इन्हें कभी धार्मिक स्थानों पर जाते हुए नहीं देखा गया। राजीव खंडेलवाल ईश्वर के विरोध में कभी कोई बात नहीं कहते, लेकिन धार्मिक स्थानों पर जाना वे पसंद नहीं करते और न ही धर्म के मामले में कुछ कहते  हुए उन्हें देखा गया है।
इस बारे में राहुल बोस का मत दूसरों से अलग है। वे खुद नास्तिक हैं लेकिन ये भी स्वीकार करते हैं कि दूसरों को ईश्वर में विश्वास करने से वह कभी मना नहीं करते। वे उन लोगों का सम्मान करते हैं जो ईश्वर में आस्था रखते हैं। भूत और वास्तु शास्त्र जैसी फिल्मों के निर्देशक राम गोपाल वर्मा भी ऐसे ही लोगों में से एक हैं। उन्होंने कभी ईश्वर को नहीं माना। आज भी उनके सिद्धांत विज्ञान पर आधारित हैं। धर्म की बात होने पर वे विज्ञान पर
आधारित तर्क देते हैं। किसी व्यक्ति का अचानक नास्तिक हो जाना भी दिलचस्प होता है। जॉली एलएलबी के निर्देशक सुभाष कपूर ने अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार को देखकर नास्तिकता के सिद्धांत को अपनाया, जिसमें अमिताभ भगवान से कहते हैं आज खुश तो बहुत होंगे तुम। नास्तिकों को समाज में स्वीकृति भी मिली है और आम नागरिकों की तरह अपनी बात कहने का हक भी। ऐसे लोगों की बढ़ती संख्या को
समय-समय पर आयोजित अवसरों में आमंत्रित भी किया जाता है। ओबामा ने अपनी इनागरेशन स्पीच में नास्तिक सेलिब्रिटीज को भी आमंत्रित किया। उनका कहना था कि मैंने कभी ऐसे लोगों के विचार नहीं सुने जो ईश्वर के अस्तित्व से ही मना करते हों। उनकी बात सुनकर मुझे ये महसूस हुआ कि दुनिया एक नई दिशा में जा रही है, जबकि ओबामा के विपरीत जॉर्ज डब्ल्यू बुश नास्तिकता के हमेशा खिलाफ रहे। वे मानते हैं कि नास्तिक भी देशभक्त नहीं हो सकते इसीलिए मैं उन्हें अपने देश में कोई भी अधिकार देने के पक्ष में नहीं हूं।

























बुधवार, 8 जनवरी 2014


इंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा 

इंटरटेनमेंट की दुनिया में छाए रहने वाले सितारे दर्शकों का मनोरंजन करने में कोई कमी बाकी नहीं रहने देते। फिर बात जब उनके इंटरटेनमेंट की आती है तब भी वे अपने घर में सारे साधन मौजूद रखते हैं जिनसे उनकी शानो शौकत बढ़ती हो। ऐसे ही साधनों में से एक है होम थियेटर। पिछले कुछ सालों में होम थियेटर का ट्रेंड इन सितारों के बीच इतना हावी है जिसके चलते वे अपने घर में होम थियेटर को विशेष महत्व देने लगे हैं। नया घर खरीदते समय भी होम थियेटर के लिए विशेष स्थान का प्रबंध करना वे नहीं भूलते आखिर सवाल उनके इंटरटेनमेंट का जो होता है....

पॉप प्रिंसेस ब्रिटनी स्पीयर्स के फैशन सेंस की आलोचना मीडिया जगत में चलती रहती है लेकिन घर में होम थियेटर स्थापित करने में ब्रिटनी ने खासी मेहनत की है। कैलिफोर्निया के कलाबासा में स्थित उनके होम थियेटर को चातो सुपेरियोस नाम दिया गया है जिसका अर्थ होता है सपनों का घर। ब्रिटनी ने इस थियेटर को टेक्सचर्ड वाल से सजाया है। यहां वाल स्पीकर और कई लोगों के बैठने की व्यवस्था है। अपने लिए होम थियेटर को डिजाइन करने वाले सेलिब्रिटीज में क्रिकेटर भी पीछे नहीं हैं। सचिन तेंदुलकर ने मुंबई के बांद्रा स्थित अपने घर में 15-20 सीटर प्रायवेट थियेटर को डिजाइन किया है। आईपीएल 4 के अंतिम दिनों में उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के साथ इस थियेटर का उद्घाटन किया। सचिन के घर में बने इस होम थियेटर का आनंद लेने में वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर की विशेष रुचि रहती है। सचिन की तरह शाहरुख खान और अजय देवगन सहित कई जाने माने उद्योगपति जैसे हर्ष गोयनका, अमित बर्मन और छगन भुजबल ने अपने घर में थियेटर स्थापित किए हैं जहां वे अपने दोस्तों और परिवार के साथ फस्र्ट डे फस्र्ट शो में फिल्म देखना पसंद करते हैं। फिर इसके लिए उन्हें फिल्म के प्रोड्यूसर को कितनी ही रकम क्यों न देना पड़े। परिवार के साथ फिल्में देखने के शौकीन मुकेश अंबानी ने एंटीलिया की आठवीं मंजिल पर पचास सीट युक्त थियेटर स्थापित किया है। उद्योगपति और राजनेता के रूप में प्रसिद्ध नवीन जिंदल 150 करोड़ के बंगले लुटियंस के मालिक हैं जिसमें  पचास सीट युक्त मूवी थियेटर है। उनके रहने से पहले इस घर को पटनी हाउस के नाम से जाना जाता था। भारत के सबसे महंगे घरों में शामिल नवीन जिंदल के घर को हेरिटेज लिस्ट में रखा गया है। आलीशान जिंदगी के शौकीन विजय माल्या का यूबी सिटी बैंगलोर स्थित घर लक्जरी की पहचान के रूप मेें जाना जाता है।
इस पेंटहाउस में लक्जरी जैसे जिम, इंडोर हीटेड पूल, स्पा, आउटडोर इंफिनिटी पूल और हेलीपेड के सारे इंतजाम हैं। उन्होंने अपने इसी घर में पचास सीट युक्त होम थियेटर बना रखा है। महंगे घर खरीदना बिलियोनेयर की शान शौकत में चार चांद लगाने जैसा होता है। तमाम साज-सज्जा से युक्त जेके हाउस में गौतम सिंघानिया रहते हैं। गौतम सिंघानिया के लिए यहां तीन हेलीपेड, हेल्थ स्पा, बालरूम और पचास सीट वाले मूवी थियेटर का निर्माण किया गया है। ओपेरा विन्फ्रे के कैलिफोर्निया स्थित घर की कीमत 50 मिलियन डॉलर है। 2001 में इस घर में रहने के लिए जाने से पहले ओपेरा ने अपने खास मेहमानों के लिए होम थियेटर बनवाया था। लक्जरी के शौकीन जॉन अब्राहम के घर में ग्लास वर्क हर जगह देखने को मिलता है। यहां तक कि उनके बाथरूम को जकूजी वाले खूबसूरत ग्लास वर्क से सजाया गया है। यहां उन्होंने 130 इंच स्क्रीन लगवाई है ताकि जकूजी के साथ वे फिल्मों और क्रिकेट मैच का मजा ले सकें। बैंगलोर स्थित किरण मजूमदार शॉ के आवास ग्लैनमोर में होम थियेटर को आधुनिक तरीके से सजाया गया है।
सेलिब्रिटी जिन घरों में रहते हैं, वे हमेशा आम लोगों के बीच चर्चा का विषय होते हैं और इसी तरह उनके होम थियेटर किसी सपने के सच होने की तरह ही हैं।
इन्हीं में से एक है व्हाइट हाउस का रेट्रो थियेटर जिसकी शान देखते ही बनती है। अभिनेत्री खुशबू पिछले सात सालों से नए साल की किसी पार्टी में शामिल होने के बजाय दोनों बेटियों अवंतिका और आनंदिता के साथ अपने घर में स्थित थियेटर में रात भर फिल्में देखना पसंद करती हैं।  इस बार उन्होंने नए साल को ध्यान में रखते हुए दिसंबर से पहले ही अपने होम थियेटर का मेकओवर किया था। 

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

ऐसी लागी लगन 

जिस तरह से भारतीय संस्कृति में हिंदू धर्मगुरुओं का महत्व सदियों से कायम है, उसी तरह देश की राजनीति में उनकी चर्चा हमेशा से रही है। फिर बात अगर चुनावी माहौल की हो तो मध्यप्रदेश सहित अन्य चुनावी क्षेत्र अपने-अपने राजनैतिक गुरुओं के सानिध्य में मार्गदर्शन लेते नजर आ रहे हैं। इन धर्मगुरुओं पर राजनेताओं का अटूट विश्वास ही इन्हें राजनैतिक मार्गदर्शक के रूप में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है....

प्रदेश के सियासी हलकों में आध्यात्मिक झुकाव सहसा बढ़ गया है। टिकट के लिए हाथ-पांव मारने वाले हों या उम्मीदवारी तय होने के बाद जीत की आशा से लबरेज राजनीति के खिलाड़ी, सभी धार्मिकता के प्रवाह में बहे चले जा रहे हैं। उन्हें जहां से भी आशीर्वाद या चमत्कार की जरा-सी भी आशा है, वहां मत्था टेकने से वे कतई गुरेज नहीं करते। लिहाजा, धर्मगुरुओं के यहां आने वाले सफेद कुर्ताधारियों की संख्या में खासा इजाफा हो गया है। वे हर हाल में टिकट और जीत चाहते हैं। जिन धर्मगुरुओं की राजनीति में पैठ है, उनके शागिर्द दिल्ली के राजनीतिक गलियारों के अलावा मठों व धार्मिक स्थलों पर भी देखे जा सकते हैं। राजनेताओं के बीच छाए हुए ऐसे ही धर्मगुरुओं में से एक हैं रावतपुरा सरकार के नाम से मशहूर संत रविशंकर। इनका नाम चंबल क्षेत्र के रावतपुरा गांव में हनुमान मंदिर बनने के साथ ही मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के राजनेताओं के बीच पहचाना जाने लगा। वे पॉलिटिकल साधु के रूप में पहचाने जाते हैं। पूर्व गृह राज्यमंत्री डॉ. गोविंद सिंह के साथ उनके संबंध जगजाहिर हैं। उनके नाम से रायपुर में विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा किये गए कार्य देखते ही बनते हैं। उनके ट्रस्ट रावतपुरा सरकार एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स ने फार्मेसी, नर्सिंग, आधुनिक विज्ञान और स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना न सिर्फ मध्यप्रदेश, बल्कि छत्तीसगढ़ में भी की। सूूत्रों के अनुसार रावतपुरा सरकार एक संत के रूप में 1990 से प्रसिद्ध हुए। उस समय उनकी उम्र महज सत्रह साल थी। जल्दी ही उनकी आध्यात्मिक शक्ति का अंदाजा राजनेताओं को हुआ और मध्यप्रदेश के कुछ प्रमुख सांसदों की गिनती उनके भक्तों के रूप में होने लगी। गोपाल भार्गव और प्रभात झा ऐसे ही नामों में से एक हैं। उमा भारती और दिग्विजय सिंह अक्सर उनसे संपर्क करते हैं। सत्यनारायण शर्मा जो फिलहाल छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के मंत्रिमंडल में हैं, रावतपुरा सरकार के प्रिय भक्तों में से एक हैं।
चुनावी दंगल में उतरे उम्मीदवारों में कोई वैष्णो देवी के दर्शन कर मन्नत मांग रहा है तो कोई नर्मदा तट पर चातुर्मास कर रहे संत महात्माओं का आशीर्वाद ले रहा है। ऐसे ही संतों में एक हैं भय्यू जी महाराज।
सूर्योदय आश्रम मिशन के प्रणेता उदय सिंह देशमुख उर्फ  भय्यू जी महाराज कभी मॉडल रह चुके हैं और आज वह कई राजनेताओं के लिए रोल मॉडल बन गए हैं। आध्यात्मिक गुरु होने के बावजूद हर दल के नेताओं से उनके नजदीकी सम्बंध हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, नितिन गडकरी, उद्धव ठाकरे और विलासराव देशमुख से उनके अच्छे सम्बंध हैं।
मध्यप्रदेश के शुजालपुर में जन्मे उदय सिंह देशमुख उन लोगों में से हैं, जिन्हें कार्पोरेट जगत और मॉडलिंग की दुनिया रास नहीं आई। उन्होंने उस चकाचौंध की दुनिया को छोड़कर समाज सुधार का अभियान छेड़ा। इसलिए समाज ने उन्हें नया नाम दिया, भय्यू जी महाराज। 44 वर्षीय भय्यू जी महाराज को देखकर पहली नजर में लगता नहीं कि वह कोई संत हैं।
उनके ट्रस्ट द्वारा किसानों के लिए धरतीपुत्र सेवा अभियान और भूमि सुधार, जल, मिट्टी व बीज परीक्षण प्रयोगशाला, बीज वितरण योजना चलाई जाती है। विजयवर्गीय और रमेश मंडोला उनके करीबी हैं। इसी तरह कनकेश्वरी देवी के परम भक्तों मे से एक हैं कैलाश विजयवर्गीय, रमेश मंडोला और युवा भाजपा सांसद विश्वास सारंग जिन्हें उनके आश्रम में अक्सर देखा जाता है। कनकेश्वरी देवी को उनके भजनों के लिए जाना जाता है। उनके कार्यक्रम प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में आयोजित होते रहते हैं। जिन दिनों भोपाल में उनके भाषण हुए थे तब विजयवर्गीय के घर वे ठहरी थीं और इस साध्वी के सम्मान में उनके घर को दीवाली की तरह रोशनी से सजाया गया था। संतों के मुरीद उनके सम्मान में कोई कमी नहीं रहने देते। स्वामी अवधेशानंद के मुरीदों में कांग्रेस नेता अजय सिंह का नाम सबसे पहले आता है। स्वामी जी साल में कम से कम एक बार प्रवचन के लिए भोपाल अवश्य आते हैं और वे जब भी यहां आते हैं, अजय सिंह के अतिथि होते हैं। पिछली बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी साधना सिंह के साथ अवधेशानंद जी गिरि के श्रीमद्भागवत कथा प्रसंग में शामिल हुए थे। आधुनिक तकनीकी और वो भी खासतौर से कंप्यूटर का प्रयोग अपने भक्तों को मार्गदर्शन देने के लिए करने वाले नामदेव दास त्यागी को कंप्यूटर बाबा के नाम से जाना जाता है। 2006 में उन्होंने दावा किया था कि वे लोगों की समस्या का समाधान उतनी ही जल्दी कर सकते हैं जितनी जल्दी कंप्यूटर करता है। उनका आश्रम इंदौर में एरोड्रम रोड पर गोमतगिरि के पास है। सन 2006 में  बाबा उस समय लोगों की नजरों में आए जब उन्होंने इंदौर कलेक्टर विवेक अग्रवाल के विरोध में भूख हड़ताल की थी। विवादों से घिरे बाबा के अनुयायियों में कैलाश विजयवर्गीय और उनके करीबी रमेश मंडोला का नाम लिया जाता है। देपालपुर के कांग्रेस सांसद सत्यनारायण पटेल उनके परम भक्तों में से एक हैं। सन 90 में राम मंदिर आंदोलन के बाद से संत महात्माओं का प्रत्यक्ष पदार्पण राजनीति में देखते ही बनता है जिसकी चर्चा निरंतर जारी रहती है। मध्यप्रदेश की राजनीति में एक ओर जहां कई साधु-संतों ने हाथ आजमाया, वहीं ऐसे भी कई नाम हैं जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीति से अलग रहते हुए भी राजनेताओं के सलाहकार और कर्ताधर्ता के रूप में छाए रहते हैं। इन्हीं में जगद गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज का नाम प्रसिद्ध है। मध्यप्रदेश के राजनेताओं के बीच शंकराचार्य का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। यद्यपि अक्सर इन्हें कांग्रेसी शंकराचार्य के नाम से संबोधित किया जाता है लेकिन भाजपा के कई दिग्गज भी इनके परम भक्त हैं। जब वे भोपाल आते हैं तो शिवराज सिंह चौहान, दिग्विजय सिंह और बाबूलाल गौर उनसे आशीर्वाद लेने जाते हैं। गोटेगांव स्थित उनके आश्रम में बड़ी संख्या में राजनेताओं को देखा जाता है।



श्रद्धा, भक्ति और विश्वास


सास-बहू से अलग हटकर छोटे परदे पर पौराणिक धारावाहिकों का प्रसारण बढ़ता जा रहा है। इन धारावाहिकों से दर्शकों की श्रद्धा जुड़ी हुई है। तभी तो दर्शकों की भक्ति और विश्वास का ख्याल रखते हुए वे उनकी हर कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास करते हैं। इन भूमिकाओं के लिए कड़ी मेहनत के साथ ही पौराणिक पात्रों के बारे में पूरी जानकारी और भारी मेकअप व कपड़े पहनना भी उनके काम का एक हिस्सा होता है। कभी दर्शक इन्हें भगवान की तरह पूजते हैं तो कभी संघर्ष के बीच खास मुकाम बनाए रखने की जद्दोजहद के बीच टीवी की टीआरपी में वे आगे बढ़ते जाते हैं...
लाइफ ओके पर प्रसारित देवों के देव महादेव में भगवान शिव की भूमिका में मोहित रैना की चर्चा हर घर में है। कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले मोहित रैना चार्टर्ड अकाउंटेंट की तैयारी कर रहे थे लेकिन इस बीच उनका चयन इस शो के लिए हुआ और वे टीवी अभिनेता बन गए।
मोहित रैना ने इससे पहले मिथुन चक्रवर्ती के साथ फिल्म डॉन मुथु में काम किया है। वे साई फाई टीवी शो अंतरिक्ष, चेहरा, बंदिनी और गंगा की धीज में नजर आए। 31 साल के मोहित अपने स्वर्गीय पिता के साथ अक्सर अमरनाथ मंदिर जाते थे और खुद भी भगवान शिव के भक्त हैं। भगवान शिव की भूमिका के लिए मोहित को तैयार होने में 90 मिनट लगते हैं उसके बाद काफी समय उनके मेकअप को फाइनल टच देने में चला जाता है। मोहित को इस बात की खुशी है कि लोग उन्हें शिव के रूप में पसंद करते हैं। इसके अतिरिक्त मोहित रैना कहते हैं कि शिव के चरित्र के विभिन्न शेड्स हैं जैसे रोमांस, एक्शन आदि। सच तो यह भी है कि अब तक महादेव को कैलेंडर आर्ट तक सीमित रखा गया था लेकिन इस धारावाहिक की वजह से शिव के व्यक्तित्व की उन बातों को भी प्रचारित किया जा रहा है जो अब तक आम जनता की निगाह से छुपी हुई थीं। लोगों के बीच होने पर उन्हें भगवान का स्थान दिया जाता है। लोग चाहते हैं कि वे उन्हें आशीर्वाद दें। उनसे अधिक उम्र के लोग भी उनके चरण स्पर्श करते हैं। इसी तरह अपने चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान सदैव बनाए रखने वाले सौरभ राज जैन स्टार प्लस पर प्रसारित महाभारत में भगवान कृष्ण की भूमिका में हैैं। 28 साल के सौरभ ने एमबीए किया है और इन दिनों वे भगवान कृष्ण से संबंधित अलग-अलग किताबें पढ़कर उनके बारे में अपनी जानकारी बढ़ा रहे हैं। सौरभ ने इसके पहले जय जय जय श्री कृष्ण में भगवान विष्णु की भूमिका की थी। वे एक कुशल नर्तक भी हैं। धोती, मुकुट, मेकअप और भारी कपड़े पहनने में उन्हें कभी असुविधा नहीं होती। सौरभ के अनुसार कृष्ण की ऊर्जा को मैं अपने अंदर महसूस करता हूं। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले महाभारत में भगवान कृष्ण को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया था, स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले महाभारत में कृष्ण की भूमिका उससे अलग है जो दर्शकों को लुभा रही है। सौरभ अपने अनुभव को याद करते हुए कहते हैं कि एक बार एक महिला अपने नवजात शिशु को मेरे पास लेकर आई और कहने लगी कि आप कृष्ण हैं। इसे आशीर्वाद दीजिए। मैंने उसे समझाया कि मैं भी एक आम इंसान हूं, भगवान कृष्ण नहीं लेकिन जब वह नहीं मानी तो मैंने उस बच्चे को आशीर्वाद दिया। पौराणिक पात्रों के अनुरूप दिखने के लिए महाभारत में भीष्म की भूमिका में आरव चौधरी दर्शकों की कसौटी पर खरे उतरे हैं। 43 साल के आरव ने इस धारावाहिक के लिए अपना वजन बॉडी बिल्डर रोहित शेखर के मार्गदर्शन में बारह  से चौदह किलो तक बढ़ाया। आरव पिछले दो दशकों से दर्शकों का मनोरंजन करते रहे हैं। इससे पहले दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले महाभारत में भीष्म की भूमिका मुकेश खन्ना ने अदा की थी जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। उसी भूमिका पर दूसरी बार बनने वाले महाभारत में खरा उतरना आरव के लिए मुश्किल था। आरव ने हर चुनौती का सामना किया। आरव कहते हैं कि भीष्म हर उम्र के लोगों को प्रेरित करते हैं। इस किरदार के लिए मैंने जी तोड़ मेहनत की है। आरव शूटिंग के समय दस किलो का मुकुट, लगभग उतनी ही भारी तलवार और अन्य वजनदार एक्सेसरीज पहनते हैं। इस भूमिका के लिए वे कश्मीर की वादियों में भी कड़ी ठंड के बीच शूटिंग करते और उसके बाद अपने फिटनेस शेड्यूल को भी बनाए रखते हैं। आरव ये मानते हैं कि अपने वचन के पक्के भीष्म और आरव के स्वभाव में बहुत समानता है। भीष्म जो कहते थे, वो कर दिखाते थे इसी तरह आरव भी अपनी बात के पक्के हैं। आरव की नजरों में इस भूमिका के लिए हमारे देश में दो ही कलाकार उपयुक्त हैं। एक अमिताभ बच्चन जिनका व्यक्तित्व भीष्म पितामह से मिलता-जुलता है और दूसरा डेनी डेनजोंग्पा जो अच्छे पिता, पति और बेटे हैं। ट्विटर पर वे आरेवियन के नाम से छाए रहते हैं। उनके फॉलोअर्स में सबसे ज्यादा संख्या लड़कियों की है। आरव के अनुसार उनसे मिलने वाले कई लोग उनसे अपने प्रसिद्ध डायलॉग बोलने का आग्रह करते हैं। आरव ने पिछले बीस सालों में फिल्मी जगत में बहुत संघर्ष किया। वे कहते हैं अगर कभी उन्हें भीष्म से मिलने का मौका मिले तो वे इस क्षेत्र में किए संघर्ष के बदले उनसे अपने सुरक्षित कैरियर की मांग करेंगे। सहारा वन पर प्रसारित गणेश लीला में नारद मुनि की भूमिका में धीरज मंगलानी को दर्शकों ने सराहा। एक बार फिर वे इसी भूमिका में कलर्स पर प्रसारित जय जगजननी मां दुर्गा में नजर आ रहे हैं। धीरज के अनुसार नारद मुनि को उनकी चुगलखोरी की वजह से लोग जानते हैं लेकिन उनकी भावनाएं बहुत अच्छी थीं, जिन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में पहले से ही पता चल जाता था। धीरज यही रोल प्रज्ञा चैनल में सूर्य पुराण और सोनी पर बबोसा मेरे भगवान के लिए भी कर रहे हैं। उनके पास देवों के देव महादेव से भी प्रस्ताव आया था लेकिन वे नारद मुनि की भूमिका से संतुष्ट हैं इसलिए उन्होंने किसी और भूमिका के लिए मना कर दिया।
बॉक्स में
बदल गया दौर
अगर पिछले उदाहरणों को देखा जाए तो दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले रामायण में अरुण गोविल राम की भूमिका में व महाभारत में नीतीश भारद्वाज कृष्ण की भूमिका में बहुत चर्चित थे, लेकिन जैसे ही उनके धारावाहिकों पर विराम लगा तो वह भी लोगों की यादों से गायब हो गए। अब जो कलाकार पौराणिक धारावाहिकों में अभिनय कर रहे हैं वे ये मानते हैं कि समय बदल गया है। एक माध्यम के  रूप में आज टेलीविजन पहले की तुलना में अधिक सशक्त है। बॉलीवुड का हर टॉप अभिनेता टीवी पर अपनी मौजूदगी दर्ज करना चाहता है। साथ ही टेलीविजन के कलाकार भी बॉलीवुड में बहुत सफल हो रहे हैं इसलिए अब छोटा पर्दा 'छोटाÓ नहीं रहा है।

दर्द जब हद से गुजर जाए

देश-विदेश के मशहूर खिलाड़ी हर दिल पर राज करते हैं। उनके पास बेशुमार दौलत है, और दर्द बांटने के लिए एक पार्टनर भी, फिर भी उनकी जिंदगी में कई बार ऐसे लम्हे आते हैं जब वे डिप्रेशन का सामना करते नजर आते हैं। पिछले दिनों ऐसा ही कुछ इंग्लैंड क्रिकेट टीम के अनुभवी बल्लेबाज जोनाथन ट्रॉट के साथ भी हुआ...

जोनाथन ट्रॉट लम्बे समय से चली आ रही तनाव सम्बंधी समस्या के कारण एशेज शृंखला बीच में ही छोड़कर स्वदेश लौट गए। वह इस समस्या से उबरने के लिए अनिश्चितकाल तक  क्रिकेट से ब्रेक ले रहे हैं। ट्रॉट ये भी मानते हैं कि इस समय वे अपनी टीम को 100 फीसदी योगदान नहीं दे पा रहे हैं। डिप्रेशन के चलते इंग्लैंड के क्रिकेटर मार्कस ट्रेस्कोथिक ने अंतर्राष्टï्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया। बत्तीस वर्षीय ट्रेस्कोथिक पिछले कुछ वर्षों से तनाव संबंधी बीमारी से जूझ रहे हैं और इस कारण विदेश यात्रा में उन्हें काफी परेशानी हो रही थी। ट्रेस्कोथिक ने अपना आखिरी टेस्ट मैच पाकिस्तान के खिलाफ ओवल के मैदान में अगस्त 2006 में खेला था। वर्ष 2006 के आखिर में ट्रेस्कोथिक को ऑस्ट्रेलिया दौरे से लौटना पड़ा था और इसके बाद से ही वे किसी विदेशी दौरे पर नहीं गए। इस दौरान उन्हें ये महसूस हो रहा था जैसे वे कैंसर जैसी किसी जानलेवा बीमारी के शिकार हैं। वे कहते हैं डिप्रेशन के दौरान मुझे उन लोगों की तकलीफें समझ में आईं जो आत्महत्या कर लेते हैं। यहां ये समझना जरूरी है कि ये इंसान की कमजोरी नहीं, बल्कि बीमारी होती है। ये बीमारी किसी को नहीं छोड़ती। फिर चाहे वह सेरेना विलियम जैसी मशहूर टेनिस खिलाड़ी ही क्यों न हो। ग्यारह बार गे्रंड स्लेम का खिताब जीतने वाली टेनिस चैंपियन ने अपने जीवन में डिप्रेशन का सामना उस समय किया, जब उनकी बहन येतुंडे की अचानक मृत्यु हो गई। सेरेना अपने अनुभव को याद करते हुए कहती हैं कि उस वक्त मुझे ये अहसास हो रहा था जैसे सारी दुनिया मेरे लिए खत्म हो गई है। मैं ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी और मुझे अकेले रहने की सख्त जरूरत थी। जब मुझ पर मानसिक दबाव नहीं होता तभी मैं खेल के दौरान अपना शत-प्रतिशत दे सकती हूं लेकिन उस समय मेरे लिए सबसे जरूरी खेल में प्रदर्शन की चिंता किए बिना मुश्किल हालातों से बाहर आना था। एक बार डिप्रेशन हो जाने पर उससे उबर पाना आसान नहीं होता। ओलंपिक में 800 और 1500 मीटर दौड़ जीतने वाली केली होम्स मानसिक अवसाद का बयान करते हुए कहती हैं कि जब मुझे डिप्रेशन हुआ तो ऐसा लग रहा था जैसे जीवन की सारी आशाएं खत्म हो गई हैं। मैं कैंची से अपने हाथ की नस काट लेना चाहती थी। आगे क्या होगा इसके बारे में सोचना भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। उस वक्त मेरे जीवन में कुछ भी सुखद कहलाने के लायक नहीं था। एक बार डिप्रेशन के चंगुल में फंस जाने पर उससे बाहर आना मेेरे साथ-साथ किसी के लिए आसान नहीं होता। इंग्लैंड के पूर्व विकेट कीपर और पहले समलैंगिक क्रिकेटर स्टीव डेविस 2012 में अपने दोस्त टॉम मेनार्ड की मृत्यु के बाद डिप्रेशन में आ गए। डिप्रेशन के चलते खुद को खेल से दूर रखने वाले खिलाडिय़ों में इंग्लैंड विकेटकीपर टीम एंब्रोस का नाम शामिल है। उन्होंने 2009 से क्रिकेट मैच नहीं खेला। वे खुद यह मानते हैं कि उनकी दिमागी हालत टीम के साथ पूरा इंसाफ करने के लायक नहीं है। आस्ट्रेलिया के फास्ट बॉलर शॉन टेट ने 2008 में क्रिकेट से यह कहकर ब्रेक लिया कि उनके दिमाग को आराम करने की जरूरत है।

सुर मिले न साज


एक दौर वो था जब किसी संगीतकार के साथ अपने सुर मिलाने के लिए देश के महान गायक घंटों रियाज करते थे और उसके बाद गाने की रिकार्डिंग की जाती थी। आज के दौर में युवा गायकों को संगीतकारों के साथ रिकार्डिंग और रिहर्सल करने का मौका भी नहीं मिलता क्योंकि वे अपने साउंड ट्रेक स्टूडियो में ई-मेल करके भेज देते हैं, जिसे साउंड इंजीनियर की मदद से रिकार्ड कर लिया जाता है। बाद में जो क मी दिखती है उसे आधुनिक तकनीकी की मदद से छिपा लिया जाता है। नए युग की तकनीकी जितनी युवाओं की मदद कर रही है, उतना ही उसका नुकसान संगीतकारों का सानिध्य छिन जाने के रूप में सामने आ रहा है। क्या ये मशीनेें संगीत में जान डालने का काम भी कर सकती हैं। अगर हां तो वो समय दूर नहीं जब देश के उम्दा गायक इसी चक्रव्यूह में अपना भविष्य खोते नजर आएंगे...

 स्नेहा पंत तकरीबन 15 साल पहले दिल्ली से मुंबई आई थीं। उनमें गायिकी की वो सारी खूबी थी जो किसी भी कुशल गायक के लिए जरूरी होती है। उन्होंने किराना घराना से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। कल्याण जी-आनंद जी ने उनकी आवाज की तारीफ की और 1998 में स्नेहा ने सा रे गा मा पा में श्रेया घोषाल को हराकर खूब नाम कमाया था। स्नेहा ने 2001 में सुभाष घई की फिल्म 'यादेेंÓ मेें दिल की दुनिया में गाना गाया था। फिल्म के संगीतकार अनु मलिक इस गाने के लिए उनकी आवाज को परफेक्ट मानते हैं। उसके बाद हर दूसरी फिल्म के लिए नई आवाज की तलाश करने वाले संगीतकारों के बीच स्नेहा की मधुर आवाज गुम हो गई।
हिंदी फिल्मी जगत में एक वो दौर था जब संगीतकारों को सुपरस्टार माना जाता था लेकिन अब हर दूसरी फिल्म में सुनाई देने वाली नई आवाज को श्रोता सुनते हैं और जल्दी ही भूल जाते हैं। इस दौर में फिल्म निर्माण की नई तकनीकी का असर गायकी पर भी दिखाई देता है। इस बात से आज भी इंकार नहीं किया जा सकता कि किसी भी फिल्म की सफलता में उस फिल्म के संगीत का बड़ा हाथ होता है। दर्शकों का उस गाने के गायकों से भावनात्मक लगाव पैदा होता है। फिर चाहे वो मोहम्मद रफी हों या किशोर कुमार। यहां तक कि जब 1949 में फिल्म दिल्लगी में सुरैया के मशहूर गीत तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी और 1954 में मिर्जा गालिब का गाना दिल-ए-नादान रिलीज हुई तो उनकी आवाज के दीवाने मैरिन ड्राइव पर सुरैया के घर के सामने उनकी एक झलक के लिए रोज घंटों खड़े रहते थे। लता मंगेशकर के लिए बड़े गुलाम अली खान कहते थे कमबख्त कभी बेसुरी नहीं होती।
आज के संदर्भ में संगीत की समझ रखने वाले महान गायकों से अलग वो दौर जारी है जहां आवाज की मधुरता पर किसी का ध्यान नहीं है। गैंग ऑफ वासेपुर के लिए स्नेहा खांवलकर पटना की दो हाउसवाइफ को गाने के लिए लेकर आई थी। जिंदगी न मिलेगी दोबारा में रितिक रोशन, अभय देओल और फरहान अख्तर पर फिल्माया गया सेनोरिटा गीत के लिए प्रोडक्शन हाउस से जुड़े लोगों की आवाज ली गई थी। तलाश में सुमन श्रीधर, लुटेरा में शिल्पा राव, मिका सिंह और शेफाली की आवाज आज युवाओं के बीच छाई हुई है। गायिका महालक्ष्मी अय्यर के अनुसार अगर आपकी आवाज दूसरों से अलग है तो उसे पसंद करने वालों की कमी नहीं है। कैलाश खेर भी इस बात से सहमत हैं और कहते हैं कि गायकी में बदलाव इस दौर की परंपरा साबित हो रही है। इस बदलाव का असर देश के स्थापित गायक सोनू निगम, सुनिधि चौहान, शान और केके के संगीत कैरियर को भी प्रभावित कर रहा है जिसकी वजह से उनकी आवाज भी अब कम ही सुनाई देती है। किसी जमाने की वो धारणा जिसमें राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार की, आमिर खान के लिए उदित नारायण की आवाज को उपयुक्त माना जाता था, अब नहीं रही। नूतन और मधुबाला के हर गाने को लता मंगेशकर की आवाज से पहचाना जाता था लेकिन गायक अभिजीत भट्टाचार्य का कहना है कि आज किसी गायिका द्वारा बीस गाने गाने के बाद भी कोई उसका नाम नहीं जानता। संगीतकार राम संपथ के अनुसार इस युग के संगीतकार स्वतंत्र हैं और वे अलग-अलग तरह की आवाज के साथ प्रयोग करना पसंद करते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम सुर के साथ समझौता करते हैं। कुछ हटकर सुनने की चाह इस समय के श्रोताओं में इस हद तक है जिसके चलते वे कुछ करने की धुन में हमेशा दिखाई देते हैं। शांतनु मोइत्रा ने परिणिता के लिए यह कोशिश की थी कि आवाज में क्लासिकल कम हो जो वेबसाइट पर युवाओं की पसंद बन सके। इसकी एक बड़ी वजह भारतीय सिनेमा में महिलाओं के पात्र में जिस तरह का बदलाव हुआ है, उसका असर गायकी पर भी दिखाई देता है। कुछ दशक पहले आम भारतीय महिला की आवाज के लिए लता मंगेशकर और लीक से हटकर गानों के लिए आशा भोंसले की आवाज को उपयुक्त माना जाता था। 1990 तक आर्केस्ट्रा में रहने वाले सौ लोगों को रिकार्डिंग से पहले अलग-अलग विभाजित किया जाता था। फिर ओ पी नैयर, अनिल बिस्वास और नौशाद इस बात पर भी ध्यान देते थे कि जिस अभिनेता के लिए गीत गाया जा रहा है, उस गायक के अनुसार आवाज को रूपांतरित किया जाए। इन बातों का ध्यान रखते हुए राज कपूर खुद रिकार्डिंग के समय स्टूडियो में मौजूद रहते थे। आजकल की जाने वाली रिकार्डिंग एक छोटे कमरे तक सीमित होकर रह गई है जहां गाने के अलग-अलग हिस्सों को अलग समय में रिकार्ड किया जाता है। अभिजीत भट्टाचार्य के अनुसार इन दिनों रिकार्डिंग के समय संगीतकार भी वहां रहना जरूरी नहीं समझते। वे ई-मेल से अपना ट्रेक भेज देते हैं और साउंड इंजीनियर गायक के साथ उसे रिकार्ड करता है। पूरा गाना एक दिन में कभी रिकार्ड नहीं होता। एक गायक को सबसे बुरा उस समय लगता है जब उससे कहा जाता है आप एक्सप्रेशन दीजिए बाकी हम संभाल लेंगे। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कभी सुर की तान पर सबसे ज्यादा ध्यान देने वाले फिल्मी जगत में आज बेसुरापन गलत नहीं माना जाता। इसके बाद भी युवा गायक मानते हैं कि संगीत जगत में रचनात्मकता खत्म नहीं हुई है। आधुनिक तकनीकी की मदद से किसी गायक की आवाज की कमियों को तो छुपाया जा सकता है लेकिन आवाज में जान नहीं डाली जा सकती। गायकी की ये वही विशेषता है जिसका जवाब देना किसी के लिए भी मुश्किल ही होगा।