शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

सियासत की चाह में सेलिब्रिटी


चारों तरफ चुनाव के चर्चे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में राजनैतिक पार्टियां चर्चित चेहरों को अपनी पार्टी में उतार रही हैं। नंदन नीलकेणी बैंगलोर से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। रिटायर्ड आर्मी चीफ जनरल वी के सिंह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर मौजूद थे। एथलीट कृष्णा पूनिया कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लडऩे को तैयार हैं और ओलंपिक चैंपियन राज्यवर्धन सिंह राठौर चुनाव लडऩे के कारण सैन्य सेवा से इस्तीफा दे चुके हैं। सच तो यह है कि  राजनीति जो करवाए कम है। किसी ने अपनी नौकरी दांव पर लगा दी तो कोई अपने शानदार फिल्मी कैरियर को छोड़कर राजनैतिक दांवपेंच सीखते देखे जा रहे हैं...
  2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के 52 साल पुराने रिकॉर्ड को तोडऩे वाली डिस्कस थ्रोअर पूनिया ने कांग्रेस के टिकट पर राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया है। नवंबर में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए पूनिया को सदुलपुर से टिकट मिलने की उम्मीद है। एथेंस ओलंपिक्स में भारत को सिल्वर मेडल दिलाने वाले राज्यवर्धन सिंह राठौर औपचारिक तौर पर बीजेपी के साथ जुड़ गए। ओलंपिक में शूटिंग में भारत को सिल्वर मेडल दिलाने वाले राज्यवर्धन सिंह राठौर ने राजनीति में आगाज करते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया। गौरतलब है कि राठौर ने 2004 में भारत को एथेंस ओलंपिक में डबल ट्रैप शूटिंग में सिल्वर मेडल दिलाया था। राठौर के अनुसार खेलों में जो मेरी उपलब्धि है, वो व्यक्तिगत है लेकिन राजनीति मेरे जीवन को संपूर्णता प्रदान करेगी। सेलिब्रिटीज का राजनीति में पदार्पण नया नहीं है। साल दर साल कई सेलेब्स राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इस लिस्ट में सुनील दत्त, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र, राज बब्बर, शत्रुघ्न सिन्हा, गोविंदा, कीर्ति आजाद और मोहम्मद अजहरउद्दीन का नाम शामिल है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों से भी चुनावी मैदान में उतरने वाले दिग्गजों की कमी नहीं है जैसे आर्मी से बी सी खंडूरी और जे एफ आर जेकब, डिप्लोमेसी से शशि थरूर या विज्ञान जगत से राजा रमन्ना। शत्रुघ्न सिन्हा कहते हैं कि सेलिब्रिटी का राजनीति में आना अपनी मर्जी से विवाह करने जैसा है। इस परंपरा के चलते राजनैतिक पार्टियां लोगों के दिलों पर राज करने वाली इन हस्तियों को अपनी शक्ति मानती हैं और अधिक से अधिक क्षेत्रों में इन्हें उतारने की कोशिश में लगी रहती हैं।
सेलेब्स इसे शोहरत और शक्ति का शॉर्टकट मानते हैं। अब जबकि देश के राजनेताओं को भ्रष्टाचार सहित अपराध और जातिगत समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, तब उनकी पार्टी में किसी नए सितारे का आगमन ताजी हवा के झोंके की तरह है। यही वजह है कि इंफोसिस के पूर्व सीईओ और विशिष्ट पहचान पत्र प्राधिकरण के अध्यक्ष नंदन नीलकेणी कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं। 2012 में फोब्र्स मैगजीन की ओर से सबसे अमीर भारतीयों में शुमार किये गये नीलकेणी अपने गृह राज्य कर्नाटक से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। कहा तो यह जा रहा है कि  कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद नीलकेणी के समक्ष उनकी पार्टी के टिकट पर चुनाव लडऩे की पेशकश की है। कांग्रेस की तरह भाजपा ने राजेश खन्ना और सुनील दत्त को अपनी पार्टी के उम्मीदवार बनाकर चुनावी मैदान में उतारा था। हालांकि इससे पहले पार्टी के इन सदस्यों की कोई राजनैतिक पृष्ठभूमि नहीं थी लेकिन लोगों के बीच इनकी पॉवर को पहचानते हुए ये फैसला लिया गया। गौरतलब है कि राम जन्मभूमि का मुद्दा जिस समय हावी था, उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत हर घर में देखे जाते थे।  तब राम की भूमिका में अरुण गोविल, सीता की भूमिका में दीपिका और रावण की भूमिका निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी को राजनीति में उतारा गया था। ये बात अलग है कि राजनीति में आने वाले सभी सेलिब्रिटी इस क्षेत्र में सफल नहीं रहे और कई ऐसे भी हैं जिन्होंने जल्दी ही राजनीति से दूरी बना ली। तुलसी के रूप में टीवी पर छाई रहने वाली स्मृति ईरानी ने राजनीति में भी कामयाबी हासिल की। यद्यपि 2004 में वे कपिल सिब्बल से हार गई थीं लेकिन इस हार से उन्हें कोई खास नुकसान नहीं हुआ। वे आज भी उनकी पार्टी की मुख्य सदस्य मानी जाती हैं।
देखा जाए तो सितारों की प्रसिद्धि हर बार राजनैतिक पार्टियों के लिए फायदे का सौदा नहीं होती। 2009 में दक्षिण भारत के मशहूर फिल्म अभिनेता चिरंंजीवी की प्रजा राज्यम पार्टी द्वारा आयोजित रैली में लाखों लोग देखे गए थे लेकिन वर्ष 2009 में हुए विधानसभा चुनावों में चिरंजीवी की पार्टी को 294 में से अठारह सीटों पर विजय प्राप्त हुई। इस सबसे अलग चर्चित चेहरों का ये विश्वास भी कायम है कि राजनीति में आने का लक्ष्य जनता की सेवा करना है इसलिए पार्टी के अन्य सदस्य क्या कर रहे हैं, इसकी वे परवाह नहीं करते। इस बात का समर्थन जयपुर के राजघराने से संबंध रखने वाली दीया कुमारी भी करती हैं जिन्होंने फिलहाल भाजपा में सदस्यता ग्रहण की है। राजनीति क्षेत्र ही ऐसा है जहां जो आज आसमां छूता नजर आता है, वहीं उसे कल जमीन का मुंह देखने में भी देर नहीं लगती। शत्रुघ्न सिन्हा और हेमा मालिनी ऐसे ही नामों में से एक है। वहीं धर्मेंद्र और अजहरुद्दीन राजनेताओं के बीच कभी-कभार देखे जाते हैं। इस बार चुनावी दंगल में कौन से सेलिब्रिटी क्या कमाल दिखाएंगे, ये तो वक्त ही बताएगा।

राइडिंग स्टार्स


घुड़सवारी करने वाले अपने शौक  के लिए किसी खास वक्त का इंतजार नहीं करते, बल्कि जब मन चाहा वे घोड़ों के साथ वक्त बिताने पहुंच जाते हैं। कई सितारे तो ऐसे हैं जिन्हें अपने इस शौक के चलते कई बार अस्पताल का मुंह देखना पड़ा, जिनमें से मेडोना भी एक हैं...

रणदीप हुड्डा तनाव दूर करने का सबसे अच्छा मंत्र घुड़सवारी मानते हैं। हरियाणा के मोतीलाल नेहरू स्कूल में पढ़ाई के दौरान भी वे घुड़सवारी करते थे। हुड्डा कहते हैं कि मेरे लिए घुड़सवारी एक रोमांचक एडवेंचर है जो मेरे पसंदीदा खेलों में से एक है। सत्रह साल बाद रणदीप ने मुंबई आकर एकबार फिर अपने इस शौक को पूरा किया। फिल्मी जगत में आने के शुरुआती दौर में जब उनके पास काम की कमी थी तो वे अपना समय घुड़सवारी करने में ही बिताते थे। रणदीप के अनुसार तनाव दूर करने का सबसे अच्छा माध्यम हॉर्स राइडिंग है। रणदीप की तरह नसरुद्दीन शाह भी इस खेल के शौकीन हैं। ये दोनों ही मुंबई में एमेच्योर राइडर्स क्लब के सदस्य हैं। हॉलीवुड अभिनेत्रियों को भी घोड़ों की सवारी करना खूब रास आता है। पूर्व ग्लैमर मॉडल कैटी प्राइस मशहूर बिजनेस वूमेन के रूप में भी जानी जाती हैं। केटी ने राइडिंग की शुरुआत बचपन में की। उन दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं कि मुझे सबसे अच्छा उस वक्त लगता था जब मैं मेरे छोटे भाई-बहनों के साथ अपने घर के अंागन में घोड़े के पीछे दौड़ लगाती थी। केटी ने घुड़सवारी का प्रशिक्षण लिया है और कई प्रतियोगिताएं भी जीती हैं। उन्हें ये भी सलाह दी गई थी कि वे ओलंपिक में प्रतिभागी बनें। वे चाइना में आयोजित हॉर्स फाइटिंग के दौरान जानवरों के साथ की जाने वाली निर्दयता के विरुद्ध भी आवाज उठाती रही हैं। अमेरिका की विश्व प्रसिद्ध पॉप स्टार मेडोना के पास कई घोड़े हैं जिन्हें उनके कई म्यूजिक वीडियोज में भी देखा गया है।
2008 में अपने पति गाय रिची और बच्चों के साथ राजस्थान में छुट्टियां बिताने के दिनों में भी उन्हें घुड़सवारी करते देखा गया था। बिना हेलमेट के घुड़सवारी करने के लिए मेडोना की आलोचना  होती रही है। अप्रैल 2009 में हेम्पटंस में गर्मी की छुट्टियां बिताने के दौरान उन्होंने वोल्फर स्टेट वाइनयाड्र्स में ये शर्त भी रखी थी कि जिस समय वे राइडिंग करेंगी, तब वहां कोई और राइडिंग नहीं करेगा। उन्हीं दिनों घोड़े से गिरने के कारण
मेडोना को अस्पताल में भर्ती किया गया था। इससे पहले भी घोड़े से गिरने पर तीन बार उन्हें अस्पताल में दिन बिताने पड़े थे। बचपन से घुड़सवारी करने वाले सितारों को अपना ये शौक अभिनय जगत में हमेशा काम आता रहा है। राजीव खंडेलवाल ने 2008 में फिल्म 'खानÓ में एक पेशेवर घुड़सवार की भूमिका निभाई थी। इस भूमिका के लिए राजीव को घुड़सवारी का प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ा, क्योंकि वे बचपन से घुड़सवारी करते रहे हैं। राजीव के पिता सेना में थे इसलिए बचपन से उन्हें राइडिंग सीखने को मिली। वे कहते हैं ये मेरा शौक है लेकिन मैं जानता हूं कि यह शौक होना और इसे पेशा बनाना दोनों में बेहद अंतर है। घोड़ों से एलर्जी रखने वाली केट मिडलटन ने पिछले साल अपने पति प्रिंस विलियम को खुश करने के लिए घुड़सवारी सीखी। विलियम की हमेशा से चाहत रही है कि मिडलटन उनके साथ घुड़सवारी करें क्योंकि उनके जीवन में शुरू से ही घोड़े महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। वह अपनी मां प्रिंसेस डायना को घुड़सवारी करते देखकर बड़े हुए हैं। उन्होंने बहुत जल्दी घुड़सवारी सीख ली थी। इसे सीखने से पहले ही उनके पास एक पोनी था। उनकी ख्वाहिश थी कि वे कैट के साथ घुड़सवारी करें।

काम संग करवाचौथ

वर्किं ग वूमन के लिए हर दिन चुनौतीपूर्ण होता है। फिर भी वे अपने सारे काम जिम्मेदारी के साथ पूरे करती हैं और साथ ही उन परंपराओं को सहेजती भी हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी पहचान साबित होती हैं। हर बार की तरह इस बार भी करवाचौथ का दिन उन सभी वर्किंग वूमन के लिए भी खास है, जिन्हें समय पर ऑफिस के काम तो करना ही है लेकिन करवाचौथ के रीति-रिवाजों का ध्यान रखते हुए इस त्योहार की सारी परंपराएं भी निभानी हैं...

फैशन डिजाइनर पूर्वी सोजतिया के लिए करवाचौथ का विशेष महत्व है। इस दिन के लिए उन्हें पारंपरिक परिधान पहनना पसंद है। करवाचौथ पर वे साड़ी पहनती हैं और वेस्टर्न ड्रेस पसंद करने वाली युवतियों से यह कहना चाहती हैं कि अगर आप करवाचौथ पर भी वेस्टर्न ड्रेसेस पहनना चाहती हैं तो इंडो वेस्टर्न स्टाइल के कपड़े पहनें जो इस अवसर के लिए भी उपयुक्त हैं। पूर्वी अगर अपने बुटिक में व्यस्त हैं तो भी कुछ समय के लिए घर आकर पूजा करती हैं और फिर अपने काम में लग जाती हैं। माडर्न स्टाइल के अनुसार कपड़े पहनने की सलाह वे इस अवसर पर भी देती हैं। आप चाहे जो भी पहनें लेकिन स्टाइलिश बने रहने का भी ख्याल रखें, साथ ही काम के तनाव से दूर रहें और इस त्योहार का मजा लेें। वर्किंग वूमन के पास अपने प्रोफेशन को समय देने के लिए पूरा साल होता है लेकिन हर दिन करवाचौथ जैसा त्योहार नहीं आता जो खासतौर से महिलाओं के लिए ही बना है। तभी तो स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं नि:संतान व टेस्ट ट्यूब बेबी विशेषज्ञ डॉ. वर्षा जैन टाइम मैनेजमेंट को महत्व देती हैं। उनके अनुसार कामकाजी महिलाओं को टाइम मैनेज करना आना चाहिए। अगर वे इस गुण को सीख लेती हैं तो दूसरे कामों के साथ ही हमारे त्योहारों और रीति-रिवाजों को मनाना उनके लिए आसान हो जाता है। हां कई बार अपने प्रोफेशन की वजह से परंपराओं को निभाना आसान नहीं होता। करवाचौथ का व्रत रखकर वे दिनभर मरीजों की सेवा में व्यस्त रहती हैं और रात को अस्पताल के काम निपटाने के बाद व्रत खोलती हैं। वर्षा कहती हैं कि कई बार चांद निकलते ही व्रत खोलना मेरे लिए मुश्किल होता है क्योंकि उस समय मैं मरीजों के साथ होती हूं और वे मेरी प्राथमिकता हैं। फिर ये भी लगता है कि एक बार चांद निकला तो अब रात भर ही दिखेगा इसलिए जल्दबाजी नहीं करती। उनके अनुसार करवाचौथ से पति-पत्नी के भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं। फिर हम चाहे कितने भी व्यस्त क्यों न हों, इन परंपराओं का सम्मान तो सभी को करना चाहिए। रीति-रिवाजों को सहेजने का गुण महिलाओं में पारिवारिक माहौल को देखते हुए अपने आप ही आ जाता है। सफल एंडएवर की डायरेक्टर मनीषा आनंद पति-पत्नी को भावनात्मक रूप से जोड़े रखने का माध्यम करवाचौथ को मानती हैं। उनकी कोशिश होती है कि उस दिन व्रत होने की वजह से अपना काम एक दिन पहले ही पूरा कर लें।  मनीषा को अब भी कुछ साल पहले मनाया गया वह करवाचौथ याद है जब रात को अपने काम में व्यस्त होने की वजह से उन्होंने अपने ऑफिस की बिल्डिंग की छत पर ही पति के साथ व्रत खोला था। मनीषा कहती हैं करवाचौथ के दिन पति के लिए व्रत रख लेने से उनकी उम्र लंबी नहीं होती लेकिन मन में एक-दूसरे के प्रति श्रद्धा तो बढ़ती ही है। कुछ महिलाएं दूसरों का दिल दुखाकर व्रत रखती हैं और करवाचौथ से संबंधित सारे रीति-रिवाज पूरे करती हैं। ऐसी महिलाओं के लिए व्रत रखने का कोई महत्व नहीं होता, जबकि व्रत की सार्थकता तो तब बनी रहती है जब कि सी का दिल दुखाए बिना व्रत रखा जाए। किसी को दुख देकर रखा गया व्रत कभी पूरा नहीं होता इसलिए करवाचौथ पर सबकी खुशियों का ख्याल रखें और खुद भी खुश रहेें। एजुकेशन एज की फाउंडर एडिटर अल्पना मिश्रा संयुक्त परिवार में रहती हैं। वे ये मानती हैं कि हर त्योहार की तरह करवाचौथ का मजा संयुक्त परिवार में ज्यादा आता है क्योंकि वहां अधिक लोग होने से खुशियों के मौके बढ़ जाते हैं। वे अपनी देवरानी के साथ मिलकर करवाचौथ की तैयारियां करती हैं। अल्पना कहती हैं आफिस के काम कभी खत्म नहीं होते लेकिन करवाचौथ जैसे त्योहार साल में एक बार ही आते हैं इसलिए इस त्योहार का आनंद लेना चाहिए। अन्य त्योहारों में रिश्तेदारों से मिलने और घर के काम करने में समय निकल जाता है लेकिन करवाचौथ पति के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करने का अच्छा माध्यम है। इस दिन ससुराल के सभी सदस्यों के साथ मिलकर पूजा करने और व्रत रखने का आनंद साल भर याद आता है।

सोमवार, 16 सितंबर 2013

रंगों में बिखरी रंगकर्म की छाप
जवा मेहता

संस्थापक जवा जोशी क्रिएटिव आट्र्स,
क्रिएटिव हेड, क्रिएटिव एप्रोच, लेेंक्सिंगटन, मास, बोस्टन



वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश मेहता की बेटी जवा मेहता पिछले चौदह सालों से रंगकर्म के साथ ही पेंटिंग की दुनिया में उनके होम टाउन लेंक्सिंगटन में अपनी क्रिएटिव कंपनी का संचालन कर रही हैं। इस साल उन्हें कला जगत में विशेष योगदान के लिए बोस्टन में वुमेन ऑफ द ईयर अवार्ड से सम्मानित किया गया। अब तक उन्होंने 250 नाटकों और 15 लघु फिल्मों में अभिनय किया है।   एक मुलाकात देश का नाम विदेशों में रोशन करने वाली जवा के साथ....

जवा एब्सट्रेक्ट और लैंडस्केप दोनों तरह की पेंटिंग बनाती हैं। वे गहरे रंगों का इस्तेमाल करना पसंद करती हैं। पिछले साल जवा ने विभिन्न प्रदर्शनी के दौरान भारतीय गांवों को अपने चित्रों द्वारा दर्शाया था और इस साल वे भारतीय लोक नृत्य पर आधारित पेंटिंग बना रही हैं। इसी साल जवा ने बोस्टन पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित एनप्लेन एयर आउटडोर पेंटिंग इवेंट्स के तहत वहां के प्रमुख सात पेंटरों के साथ लाइव पेंटिंग बनाई। रंगों की दुनिया में खास स्थान बना लेना जवा के लिए आसान नहीं था। उनके इस सफर की शुरुआत भोपाल से कुछ इस तरह से हुई।  जवा ने अपने घर में बचपन से रंगकर्म का माहौल देखा। उनके माता-पिता को लगता था कि जवा भी उन्हीं की तरह थियेटर की दुनिया में नाम कमाएंगी लेकिन जवा की रुचि पेंटिंग में थी। उन्होंने लक्ष्मीनारायण भारद्वाज से पेंटिंग की शिक्षा ली। महज तेरह साल की उम्र में जवा ने एब्सट्रेक्ट पेंटिंग बनाने की शुरुआत की। जवा ने फाइन आर्ट में पीएचडी किया और शादी के बाद वे बोस्टन चली गईं। पिछले साल पेरेलेक्स इंटरनेशनल आर्ट शो के दौरान उनके चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। वर्ष 2012 में लेंक्सिंगटन में ही जवा का सोलो आर्ट शो आयोजित हुआ था। वर्ष 2001 में इन्हें अटलांटा में गैलरी शो के दौरान सिल्वर अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा भोपाल, इंदौर, भिलाई, नागपुर और उज्जैन सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में जवा की पेंटिंग प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। जवा ने बोस्टन सहित अटलांटा में सीनियर वेब डिजाइनर साहित मल्टीमीडिया वेब डिजाइनर के तौर पर काम किया। इससे पहले वर्ष 1998 से मार्च 2000 तक भारत में सीनियर ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर काम किया। उनकी पेंटिंग में थियेटर की छाप दिखाई देती है। बोस्टन स्थित जवा के आर्ट स्कूल में हर साल लगभग 60-70 बच्चे पेंटिंग सीखते हैं। इन विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी का वर्ष में दो बार आयोजन होता है। विदेश और अपने देश की कला संस्कृति में अंतर बताते हुए जवा कहती हैं कि हमारे देश में नए कलाकारों को बढ़ावा देने में लोग हिचकिचाते हैं लेकिन विदेशों में उन्हें प्रोत्साहित न करने वाले कला के कद्रदानों की कमी नहीं है। हालांकि कला के प्रति अब भारतवासियों का नजरिया तेजी से बदला है और वे श्रेष्ठ कलाकारों की अहमियत समझने लगे हैं। रंगों के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को दर्शाने के साथ ही जवा ने बोस्टन में हिंदी मंच नाम की संस्था की स्थापना की। यह संस्था बच्चों को ड्रामा सिखाती है। इस काम में उनके पति हेतल जोशी का सहयोग सराहनीय है। जवा की सफलता का श्रेय हेतल सहित पिता सतीश मेहता और मां ज्योत्सना मेहता को है। जवा के अनुसार काम करने के लिए सबसे जरूरी इच्छाशक्ति का होना है। अगर इच्छाशक्ति प्रबल है तो काम के वक्त आने वाली हर मुश्किल से पार पाया जा सकता है। हाल ही में उनकी संस्था के विद्यार्थियों ने जिस नाटक का मंचन किया था जिसका नाम था पंडित और उसकी गाय। ये नाटक पंचतंत्र की कहानियों पर आधारित था। जवा चाहती हैं कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बारे में विदेशियों को भी पता चले और वे इसकी कीमत समझें। विदेश में रहने वाले भारतीय जवा की इस कोशिश में पूरी तरह उनके साथ हैं। वे भी चाहते हैं कि उनके बच्चे अपने देश की संस्कृति से जुड़े रहें। जवा के अनुसार मेरे विद्यार्थियों में से कोई एक भी अगर इस कला को आगे बढ़ा सका तो उस दिन मेरी मेहनत सफल हो जाएगी।
बिंदास ब्वॉयज

एक वक्त वो था जब शहर का एक आम लड़का अपनी सीधी-सादी इमेज में रहते हुए उन सारे लड़कों का प्रतिनिधित्व विभिन्न फिल्मों के माध्यम से करता था, जिसे परफेक्ट हीरो मान लिया जाता था। वक्त के साथ जिस तरह से आज के लड़के बदले हैं, वही बदलाव बॉलीवुड के हीरों की इमेज में भी दिखाई देता है। अब वह सीधा सादा और परफेक्ट नहीं, बल्कि अक्खड़, मुंहफट और बिंदास ब्वॉय के रूप में दर्शकों के सामने है। इन दिनों हिट हुई कई फिल्मों ने युवाओं की ऐसी ही इमेज को सबके बीच ला खड़ा किया है....

अगर ये कहा जाए कि एक फिल्म सिर्फ मनोरंजन की वजह से सफल होती है तो सही नहीं होगा क्योंकि फिल्म को मनोरंजन से कहीं ज्यादा इस बात के लिए याद किया जाता है कि सिनेमा हॉल के अंधेरे में कैद न रहकर वह आपकी-हमारी जिंदगी की उन खाली जगहों में दाखिल होती जाती है, जहां हम खुद को झांकते हैं। साथ ही उन  सच्चाई और सपनों के बीच हम कुछ सवाल भी  मन में जोड़ पाते हैं। इस साल बॉलीवुड में बनने वाली ऐसी ही फिल्मों में से एक है फुकरे।
फुकरे मतलब गुड फॉर नथिंग किस्म के युवा। जेब से कड़के, किसी काम के नहीं, लेकिन ऊंचेसपने। हमेशा जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किस तरह से सपने पूरे हों और बुरे काम करने में भी हिचकते नहीं हैं। ऐसे ही चार फुकरों की कहानी में जान डाली है पुलकित सम्राट के किरदार ने।
सरकारी स्कूल में पढऩे वाले दो छात्र हनी (पुलकित सम्राट) और चूचा (वरुण शर्मा) ऊंचे कॉलेज में जाने के सपने देखते हैं ताकि लड़कियों को पटा सकें । एक ही क्लास पास करने में कई साल लगाने वाले इन छात्रों को पता है कि वे इतने नंबर नहीं ला पाएंगे कि उन्हें मनपसंद कॉलेज में एडमिशन मिल सके। गलत रास्तों पर चलते हुए वे जिस परेशानी से गुजरते हैं, उसे ही फकरे में बयां किया गया है। ये कहानी स्ट्रीट स्मार्ट फुकरे लोगों की है, इसलिए संवादों में उसी तरह के शब्दों को शामिल किया है, जैसी वे भाषा बोलते हैं। ंै
युवाओं के दिल की कहानी बताने में इस साल काई पो छे ने सफलता का परचम लहराया। फिल्म काई पो छे में सुशांत सिंह राजपूत ने ईशान के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। ईशान पर क्रिकेट का जुनून सवार है। वह स्वभाव से आक्रामक है और क्रिकेट के प्रति अपनी दीवानगी के चलते वह कोई भी चुनौती लेने को तैयार रहता है। ऊपर से वह गुस्सैल और असंवेदनशील लगता है लेकिन अंदर से नर्म दिल है। फिल्म में ईशान का किरदार मौजूदा सिस्टम के प्रति नाराजगी जाहिर करता है।
फिल्म आशिकी 2 में आदित्य राय कपूर ने नशे में डूबे गायक और प्रेमी की भूमिका को पूरी तरह जिया है। फिल्म में आरोही शिरके एक बड़ी गायिका बनना चाहती है और उसकी मुलाकात जाने-माने गायक राहुल जयकर से होती है।  राहुल उसकी आवाज को सुनकर उसके कैरियर को एक मुकाम दिलाने में जुट जाता है लेकिन इस सारे चक्कर में उसका कैरियर अपने हाथ से फिसलने लगता है। राहुल शराब और हताशा के सागर में गुम हो जाता है। वह गुस्सैल, अपनी प्रेमिका की सफलता से जलने वाला, मर्जी का मालिक और अपने आसपास के लोगों से लड़ाई झगड़ा करने से न घबराने वाला है। आशिकी 2 ने आदित्य रॉय कपूर की बॉलीवुड में राह बदलने का काम बखूबी किया है। फिल्म ने चार दिन में 24.75 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इन दिनों आम चेहरे वाले लड़के हीरो की भूमिका में खरे उतरते नजर आ रहे हैं। रांझणा फिल्म के नायक कुंदन के रूप में धनुष की दो चीजों के लिए दीवानगी देखते ही बनती है। पहला जोया जिससे वह बहुत प्यार करता है और दूसरा उसका शहर बनारस। छोटे शहरों में बसने वाले आम प्रेमी की कहानी रांझणा दर्शकों के दिलों में जगह बनाने में पूरी तरह सफल रही। उसका एकतरफा प्यार एक बार फिर शाहरुख खान की फिल्म डर या अंजाम की याद दिलाता है। इरोस इंटरनेशनल की फिल्म इस फिल्म से कंपनी को पहले वीकेंड पर 31.5 करोड़ की कमाई हुई। इस साल की सुपर हिट फिल्म ये जवानी है दीवानी उन सारे युवाओं को खासा प्रभावित कर गई जो लाइफ इज एक पार्टी में यकीन करते हैं। फिल्म में नैना 'दीपिका पादुकोणÓ, बनी 'रणबीर कपूरÓ, अवि 'आदित्य रॉय कपूरÓ और अदिति 'कल्कि कोचलिनÓ चारों दोस्त हैं। सभी कॉलेज से पासआउट हुए हंसमुख समूह हैैं जो कि अपनी लाइफ हंसते-हंसते जीना चाहते हैं।
इनकी सोच तेजी से बदलती भावनाओं को बिल्कुल सही तरीके से पेश करती है। जो बताती है कि दोस्ती, प्यार और रिश्ते एक दूसरे को जोड़े रखते हैं। बनी मस्त जीवन जीने में विश्वास करता है जिसे तेज रफ्तार से जीना पसंद है और वो कहीं ठहरना नहीं चाहता। बनी का कमिटमेंट फोबिया उसे आज के युवाओं से जोड़ता है। नैना एक साधारण प्यार को सपनों की तरह जीने वाली पढऩे में तेज लड़की है। वहीं अवि और अदिति एक ऐसे अहसास के साथ जी रहे हैं जो आधुनिक समाज में समलैंगिकता को स्वीकार करने की छूट देता है। आम युवाओं को यह कहानी कहीं न कहीं अपने ही जीवन से जुड़ी हुई नजर आती है और फिल्म की यही बात इसे ब्लॉकबस्टर बनाने में सफल रही है।
हम दो
हमारे...



दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो ब"ो की चाहत में दिन-रात मन्नतें मांगते नहीं थकते और दूसरे वे जो ब"ाों के बिना आराम से जिंदगी गुजारने की ख्वाहिश रखते हैं। ऐशोआराम से भरपूर अपने जीवन में इन्हें ब"ाों की जरूरत कभी महसूस नहीं होती। क्या धीरे-धीरे हम उस परंपरा की तरफ बढ़ रहे हैं जब हम दो हमारे दो नहीं, बल्कि हम दो और हमारे कुछ भी नहीं तक परिवार सीमित होकर रह जाएगा....

ओपेरा विंफ्रे  और उनके पार्टनर स्टेडमेन ग्राहम एक दूसरे के साथ 1986 से रह रहे हैं। विंफ्रे ने कभी इस बात पर अफसोस नहीं किया कि उनके ब"ो नहीं हैं, बल्कि वे ये मानती हैं कि साउथ अफ्रीका के ओपेरा विंफ्रे लीडरशिप अकेडमी में शिक्षारत सभी लड़कियां उन्हीं की बेटियां हैं। वे कहती हैं ब"ो न होने की बात मैं कभी सोचती भी नहीं। इस अकेडमी में अभी 152 लड़कियां हैं। यह सोच सिर्फ विदेशी महिलाओं की ही नहीं है,  बल्कि हमारे देश में भी तेजी से बढ़ती भागदौड़ के बीच ब"ाों की जिम्मेदारी कुछ लोगों के लिए धीरे-धीरे बोझ बनती जा रही है। जॉर्ज क्लूनी ने हीट मैगजीन को दिए अपने इंटरव्यू में कहा था कि एक दिन एक ब"ाा मेरे घर के पास आकर रुक गया। मुझे उस वक्त ये अहसास हुआ कि मैं किसी ब"ो का पिता बनकर नहीं रह सकता। मैं कई बार एंजेलिना जोली और ब्रेड पिट से कहता हूं कि वे कुछ दिन अपने ब"ाों के साथ मेरे घर आकर रहें ताकि मुझे ये महसूस हो कि जब घर में ब"ो रहते हैं तो कैसा लगता है। ऐसा नहीं है कि पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का ब'चों के प्रति रुझान कम हुआ है लेकिन ब"ाों को प्यार करने वाली महिलाएं भी खुद ब"ो नहीं चाहतीं। इवा मेंडिस कहती हैं मुझे ब"ाों से प्यार है लेकिन मैं ब"ो को जन्म देने की इ'छा नहीं रखती क्योंकि उनके साथ रात को जाग नहीं सकती। मुझे रात को नींद खराब करना बिल्कुल अ'छा नहीं लगता। यद्यपि रेखा ने ब"ाों की चाहत कई बार अपने इंटरव्यू में व्यक्त की है लेकिन हाल ही में दिए गए अपने इंटरव्यू में उन्होंने ये कहा कि एक ब"ो की परवरिश के लिए मां और पिता दोनों की जरूरत होती है लेकिन मेरे साथ पति के न रहने पर मुझे ये अहसास हुआ कि ब"ो नहीं हुए तो अ'छा ही हुआ। मेरे लिए ब"ाों की अकेले परवरिश करना मुश्किल था। आज महिलाएं अपने परिवार के लिए रोल मॉडल हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय काउंसिल द्वारा देश के चार बड़े शहरों में किए गए सर्वे के अनुसार 18 साल से अधिक उम्र की 7& प्रतिशत लड़कियां मानती हैं कि शादी के बाद ब"ो हो जाने पर उनकी आजादी खत्म हो जाएगी।
87 प्रतिशत लड़कियां शादी के बाद निकट भविष्य में ब"ाों को जन्म देना नहीं चाहतीं। शबाना आजमी ने जावेद अख्तर से शादी की। शबाना के ब"ो नहीं हैं। फरहान और जोया अख्तर जावेद अख्तर की पहली पत्नी हनी ईरानी के ब"ो हैं। 29 वर्षीय कल्किी कोचलिन जब अपनी सहेलियों को उनके ब"ाों के साथ देखती हैं तो उन्हें इस बात का अहसास होता है कि उनकी जिंदगी में ब"ाों की जरूरत ही नहीं है क्योंकि वे शादी के बाद से ही दो ब"ाों की परवरिश कर रही हैं। उनके लिए कल्कि का पांच साल का भाई और अनुराग की पहली पत्नी की बारह साल की बेटी उनके अपने ही ब"ो हैं। कल्कि के ऐसे कई दोस्त हैं जो अपना ब"ाा नहीं चाहते। उनके पति अनुराग को भी ब"ो की ख्वाहिश नहीं है। कल्कि कहती हैं कि अब धीरे-धीरे हमारे समाज में ऐसा माहौल बढ़ता जा रहा है जहां ब"ाों से अधिक दूसरी प्राथमिकताओं की ओर लोग ध्यान दे रहे हैं। अन्य प्राथमिकताओं को महत्व देना कभी-कभी इतना जरूरी हो जाता है जिसके चलते ब"ाों की चाहत धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। ये कहना है प्रसिद्ध लेखिका अद्वैत काला का। &5 वर्षीय दिल्ली निवासी अद्वैत काला को लगता है कि अब महिलाओं की प्राथमिकताओं में ब"ो नहीं रहे। कई बार वे इस विषय पर भ्रम की स्थिति में रहती हैं, बल्कि कभी-कभी वे मेरी तरह अपनी राय स्पष्ट व्यक्त करती हैं। महिलाओं के पास अब नौ महीने तक ब"ाों को अपनी कोख में रखने और तकलीफ सहने का न तो समय है और न ही साहस। इस समय उन महिलाओं की भी कमी नहीं जो ये कहती हैं कि अगर भविष्य में कभी ब"ाों की जरूरत महसूस भी हो तो सरोगसी या अनाथ आश्रम से ब"ाों को गोद लेने जैसे विकल्पों को अपनाकर वे ब"ो की कमी को पूरा करना Óयादा पसंद करेंगी।

शनिवार, 13 जुलाई 2013

तस्वीरों में समाया मौसम मस्ताना 


कैमरा हाथ में रखना और इससे तस्वीरें खींचने का शौक तो सभी रखते हैं लेकिन हर मौसम को अपनी नजरों से देखना और प्रकृति के हर रंग की तस्वीरें कैमरे में कैद करने का हुनर सिर्फ फोटोग्राफर्स ही जानते हैं। बात अगर बारिश की हो तो इन फोटोग्राफर्स का कैमरे के प्रति जुनून देखते ही बनता है। हरी भरी वादियों और बारिश का मजा लेते नटखट बच्चों की तस्वीरें इनके कैमरे में तरह-तरह के एंगल से नजर आती हैं। शहर के फोटोग्राफर्स प्रकृति का मिजाज समझते हुए इसका भरपूर फायदा इन दिनों ले रहे हैं। सुहाने मौसम में एक नजर फोटोग्राफर्स की क्लिक पर...

मांडव का है अपना मजा
भावना जायसवाल
बारिश के मौसम में मालवांचल का हर क्षेत्र विशेष आकर्षण रखता है। इस मौसम में फोटो शूट करने की सबसे अच्छी जगह ओंकारेश्वर, महेश्वर और मांडव है। इसके अलावा ओरछा और चंदेरी हर फोटोग्राफर के लिए विशेष महत्व रखता है। प्रकृति इस समय पूरे शबाब पर है। ऐसे में अगर कुछ लोग यह मानते हैं कि बारिश का मौसम फोटोग्राफी के लिए उपयुक्त नहीं है तो ये उनकी गलत सोच है, जबकि इस मौसम से अच्छी फोटोग्राफी किसी अन्य मौसम में हो ही नहीं सकती। हमारी धरोहरों को देखने के शौकीन लोगों को अपनी ये तमन्ना जरूर पूरी करना चाहिए क्योंकि हर चीज पानी में साफ हो जाने की वजह से बहुत खूबसूरत दिखाई देती है। वेसे फोटोग्राफी करने का सबसे अच्छा समय सुबह व शाम माना जाता है लेकिन जिस समय बारिश होना बंद हो जाती है और बादल बिल्कुल साफ नजर आते हैं, उससे अच्छा समय फोटोग्राफी के लिए नहीं हो सकता।
बरतें सावधानी
- अगर इस मौसम में आप घूमने जा रहे हैं तो जिस होटल में रुकना है, उसके बारे में पूरी जानकारी पहले से ही रखें।
- ये मौसम एडवेंचर के लिए बना है इसलिए घर में रहने के बजाय घूमने-फिरने का पूरा आनंद लें।
जंगलों के बीच फोटोग्राफी
हेमंत वायंगकर
बारिश में जंगल की हरियाली को अपने कैमरे में कैद करने का अपना ही मजा है। जब तेज बारिश हो तब घने जंगलों में जाना मुश्किल होता है लेकिन बारिश कम होते ही जंगलों में वन्य प्राणियों और हरे भरे पेड़ों की तस्वीरें लेना मुझे बेहद पसंद है। इस नजरिए से बांधवगढ़ और कान्हा जाना मैं पसंद करता हूं। भोपाल में बड़े तालाब के विभिन्न दृश्य और इसके आसपास के स्थानों जैसे भीमबैठका की तस्वीरें बहुत अच्छी आती हैं। मेरे लिए सूर्योदय के बाद का समय फोटोग्राफी के लिए उपयुक्त है। इस समय प्रकृति के प्राकृतिक रंग बिल्कुल साफ दिखाई देते हैं। कुछ ऐसी तस्वीरें सिर्फ इसी मौसम में ली जा सकती हैं जैसे पानी में भीग रहे लोग, तेज पानी के बीच छतरी का उल्टा हो जाना, भीगते हुए बच्चे, छपाक से पानी में कूदना या बूंदों को हाथ में संजो लेना आदि जिन्हें हर युवा फोटोग्राफर्स को अपने कैमरे मेें
कैद करना चाहिए।
बरतें सावधानी
- जब भी घूमने जाएं तो अपने साथ कैमरा जरूर लेकर जाएं ताकि यादों को कैमरे में कैद किया जा सके।
- सुरक्षित स्थान से फोटोग्राफी करें। सिर्फ घूमने-फिरने ही नहीं, बल्कि चारों दिशाओं में फैली हरी भरी वादियों के बीच फोटोग्राफी करने के लिए भी घर से बाहर निकलें।
आंगन में प्रकृति का आनंद
शिशिर दीक्षित
इन दिनों मैं घर के आंगन में विभिन्न प्राकृतिक दृश्यों की फोटोग्राफी कर रहा हूं। पंछियों द्वारा पेड़ों पर घोंसले बनाना, कीट पतंगे, बारिश में फूलों पर पानी की बूंदों का जमा हो जाना मेरे प्रिय विषय हैं। वैसे मुझे मध्यप्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों जैसे झाबुआ और ढिंढोरी में फोटोग्राफी करना पसंद है। बारिश का मजा लेने के लिए भोपालवासियों को कहीं और जाने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि यहां की खूबसूरती का निखार बारिश में देखते ही बनता है। वन विहार, केरवा डैम के आसपास बने गांव, रातीबढ़ और नीलबढ़ की तस्वीरें बहुत अच्छी आती हैं।
बरतें सावधानी
- इन दिनों उत्तराखंड में आई विपदा की वजह से लोगों में बारिश को लेकर डर स्वाभाविक है। कई बार आप जहां जाते हैं वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा दी गई जानकारी के बाद भी लोग उनका पालन नहीं करते और बाद में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है इसलिए अगर आपको कोई पहले से सचेत करे तो उसकी बात ध्यान से सुनें और उस पर अमल भी करें।
- फिसलने वाले जूते पहनने से बचें। अपने साथ दवाइयां ले जाना न भूलें।