शुक्रवार, 5 जून 2015

आपकी पहल बचाएगी
पर्यावरण

हम अगर पर्यावरण को बचाने की बात करें तो इसकी शुरूआत सबसे पहले हमें अपने घर और फिर समाज से करना होगी। इस बात को हमारे देश में रहने वाले वे पर्यावरणविद बहुत अच्छी तरह जानते हैं जिन्होंने छोटी सी पहल के बल पर देश और फिर दुनिया के पर्यावरण की दिशा बदलने का बीड़ा उठाया है। आज उन्हीं के प्रयासों ने ये साबित कर दिया है कि एक कोशिश भी पर्यावरण को बचाने की दिशा में बेहद कारगर साबित हो सकती है....

मेनका गांधी
राजनीति के अलावा मेनका गांधी पत्रकार भी रही हैं और एक पत्रिका की संपादक भी रह चुकी हैं। उन्होंने कानून और पशुओं पर आधारित बहुत-सी पुस्तकें लिखी हैं। भारत में पशु-अधिकारों के प्रश्न को मुख्यधारा में लाने का श्रेय मेनका गांधी को ही जाता है। सन 1992 में उन्होंने पीपल फार अनिमल्स नामक एक गैर सरकारी संगठन आरम्भ किया जो पूरे भारत में (पशु) आश्रय चलाता है। उन्हें बेजुबान पशुओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाना जाता है।

ऐसे बचेगा पर्यावरण

हमारे समाज में होने वाली निर्दयता की शुरूआत सबसे पहले घर से तब होती है जब घरों में जानवरों को मारा जाता है या उनकी सही देखभाल नहीं की जाती। जानवरों पर आत्याचार कर हम अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं जिसे बच्चे देखते हैं और वो भी जानवरों के साथ घर के बड़ों की तरह अन्याय करने लगते हैं। अगर आप जानवरों के साथ हिंसापूर्ण व्यवहार कर रहे हैं तो समाज में शांति की कल्पना कैसे कर सकते हैं?

वंदना शिवा

वंदना शिवा एक दार्शनिक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं जिन्होंने पर्यावरण संबंधी नारी अधिकारवादी कई पुस्तकों की रचना की है। चिपको आंदोलन में गौरा देवी के साथ-साथ वंदना शिवा ने पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए पेड़़ों के चारों तरफ मानव चक्र तैयार करने की पद्धति को अपनाया। वैश्वीकरण के मॉडल को वंदना शिवा ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाया और पर्यावरण संरक्षण को अंतर्राष्ट्रीय फोरम का मुद्दा बनाया। उन्होंने कृषि और खाद्य पदार्थ के व्यवहार एवं प्रतिमान में परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष किया है। सबसे अहम बात है कि शिवा ने जैव-नीतिशास्त्र के मुद्दे को उठाया जो तारीफ के काबिल है। उन्होंने  पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की बात की है।

ऐसे बचेगा पर्यावरण

एक तरफ तो आप बद्रीनाथ, और केदारनाथ पूजा करने जा रहे हैं, पर दूसरी ओर ऐसी ही पवित्र जगह प्रदूषण फैला रहे हैं। अगर हम लद्दाख की बात करें तो वहां की सरकार ने यह कानून बनाया है कि सैलानी प्लास्टिक का कूड़ा अपने साथ वापस ले कर जाएंगे, वे उसे कहीं छोड़ नहीं सकते। अगर इसी तरह की नीतियां हर जगह बनने लगें तो कूड़ा करकट देखने को ही नहीं मिलेगा।

सुनीता नारायण

सुनीता नारायण की गिनती उन महिलाओं में होती है, जो वैज्ञानिक तथ्यों के लिए किसी के खिलाफ भी मोर्चा खोल सकती हैं। पेप्सी और कोका कोला में खतरनाक कीटनाशकों की उपस्थिति की बात कहकर उन्होंने न केवल भारतीय राजनीति बल्कि कारपोरेट जगत में भी भूचाल ला दिया था। इसी तरह बड़ी कंपनियों के शहद में एंटीबायोटिक होने की बात कहकर सनसनी फैला दी । अनुसंधान परियोजना और सार्वजनिक अभियानों की शृंखला में सुनीता ने हमेशा सक्रिय भूमिका निभाई है। सुनीता की महान उपलब्धियों की कारण भारत सरकार ने 2005 में उन्हें 'पदमश्रीÓ अवार्ड से सम्मानित किया था।

ऐसे बचेगा पर्यावरण
सुनीता नारायण के शब्दों में पर्यावरण आंदोलन की ताकत है सूचना, जन-समर्थन, ज्ञान आधारित निर्णय प्रक्रिया व संपर्क तंत्र और ये ही औपचारिक संस्थानों की कमजोरी हैं। हम आंदोलन की इस ताकत का समावेश शासकीय संस्थानों में कैसे कर सकते हैं? पर्यावरण आंदोलन के समक्ष अगली बड़ी चुनौती यही है।

अनुपम मिश्र
अनुपम मिश्र जाने माने गांधीवादी पर्यावरणविद् हैं। पर्यावरण के लिए वह तब से काम कर रहे हैं, जब देश में पर्यावरण का कोई विभाग नहीं खुला था। बगैर बजट के मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस बारीकी से खोज-खबर ली है, वह आज भी करोड़ों रुपए बजट वाले विभागों और परियोजनाओं के लिए संभव नहीं हो पाया है। उन्होंने बाढ़ के पानी के प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास का महत्वपूर्ण काम किया है। वे 2001 से दिल्ली में स्थापित सेंटर फार एनवायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। उनकी पुस्तक आज भी खारे हैं तालाब, ब्रेल सहित 13 भाषाओं में प्रकाशित हुई जिसकी 1 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। 1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

ऐसे बचेगा पर्यावरण
 अनुपम मिश्र कहते हैं हर युग का एक एजेंडा होता है, इस युग में विकास एजेंडा है, जिसमें खेती शब्द कहीं नहीं है। इस युग में विकास का मतलब  है बड़ी-बड़ी बिल्डिंग। प्राकृतिक संसाधनों को रुपए में कैसे बदलें, कोयला बिक जाए और लौह अयस्क बाहर बिक जाए। आजकल सारी पार्टियों का एजेंडा एक है। देश का विकास तुरंत करना। हम प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से विकास करना चाहते हैं पर यह क्यों नहीं समझते कि जब कृषि का विकास होगा ही नहीं तो मानव जाति का विकास कैसे संभव है।

माइक पांडे
प्रसिद्ध पर्यावरणविद माइक पांडे महज जंगली जीवन पर फिल्म बनाने वाले फिल्मकार ही नहीं हैं बल्कि वे एक एनजीओ के साथ मिलक र लड़कियों और उनके माता-पिता के लिए सलाहकार का काम भी करते हैं। इसके अलावा उन्होंने साबरमती आश्रम में न्यूरोपैथी की शिक्षा भी ली है और होम्योपैथिक डॉक्टर के तौर पर प्रशिक्षण भी हासिल किया है ताकि वे जिन आदिवासी लोगों के साथ जंगल में काम करते हैं, उनके बीमार पडऩे पर उनकी मदद कर सकें। माइक पांडे की कोशिशों की वजह से जंगली जानवरों की कई प्रजातियों को फायदा मिला है। भारतीय समुद्र में व्हेल शार्क को फिल्माने के लिए उन्हें कई पुरस्कारों साहित तीन बार प्रतिष्ठित ग्रीन ऑस्कर सम्मान प्राप्त है।

ऐसे बचेगा पर्यावरण
भारतवासियों की विडंबना यह है कि आज पर्यावरण की बिगड़ती हुई भयावह स्थिति को देखने के बाद भी वे हवा और पानी को लेकर संवेदनशील नहीं हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम कैसी प्रगति की ओर बढ़ते जा रहे है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए जब हम नदियों को आपस में जोड़ेंगे तो एक नदी का जहरीला पानी दूसरी नदी में भी जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि कोई नदी सूख जाए। अच्छा तो यह होगा कि इन्हीं पैसों को खर्च कर परंपरागत स्त्रोतों को फिर से जिंदा किया जाए। क्या यह सही नहीं होगा कि नदियों को आपस में जोडऩे के अलावा दूसरे विकल्प तलाशे जाएं? जरूरत तो सिर्फ इच्छाशक्ति की है।

एम वाय योगनाथन

पर्यावरणविद के रूप में एम वाय योगनाथन की कहानी बहुत दिलचस्प है। योगनाथान कोयंबटूर के ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन में कंडक्टर का काम करते थे। उन्हे पढऩा लिखना भी नहीं आता था लेकिन फिर भी पेड़ों का महत्व वे समझते थे। धीरे धीरे उन्होंने पेड़ लगाने की शुरूआत की। पिछले छब्बीस सालों में वे लगभग 38,000 पेड़ लगा चुके हैं। योगनाथन को लगता है कि उनका अशिक्षित होना पर्यावरण को बचाने की राह में कहीं भी रूकावट नहीं रहा। आज वे तमिलनाडु के विभिन्न स्कूलों में विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं।

ऐसे बचेगा पर्यावरण
जब मैं स्कूल में बच्चों को वृक्षारोपण का महत्व समझाता हूं तो वे खुद भी पौधे लगाना चाहते हैं। ऐसे में उन्हें सिर्फ समझाने से काम नहीं चलता बल्कि मैं खुद उनके साथ मिलकर वृक्षारोपण करता हूं। सच मानिए पर्यावरण को बचाने के लिए किया जाने वाला वृक्षारोपण बहुत ही आसान काम है। बस ऐसे पौधों को चुनें जिन्हें विकसित होने में कम देखभाल की जरूरत पड़े।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015


सेहत के साथी

सेहत की दुनिया में जिन एक्सपर्ट का नाम सबसे पहले आता है, उन्हें फिटनेस के प्रति बेहद जागरुक कहे जाने वाले सितारे भी अपना फिटनेस गुरू मानते हैं...

शिवोहम
फिटनेस एक्सपर्ट और लाइफ स्टाइल गुरु शिवोहम वेट लिफ्टिंग और जिमनास्टिक के माध्यम से अब तक आमिर खान, जैकलीन फर्नांडिस, अर्जुन कपूर, रणवीर सिंह, जैकी भगनानी और श्रद्घा कपूर की बॉडी बना चुके हैं।  शिवोहम एक्सरसाइज से पहले 15-20 मिनट तक मेडिटेशन को जरूरी समझते हैं। रात को देर तक जगने और अल्कोहल का सेवन करने से वे दूर रहते हैं। शिवहोम अपने क्लाइंट्स की डाइट का ख्याल तो रखते ही हंै साथ ही वे ताजा फल और प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट व फैट युक्त डाइट लेना पसंद करते हैं।
फिटनेस मंत्र
मेहनत करो और स्मार्ट रहो। हमेशा हाइजेनिक फूड खाओ और वो क ाम करो जिससे आपको मानसिक शांति मिलती हो।
यासमीन कराचीवाला
यासमीन को देश की सबसे अच्छी फिटनेस ट्रेनर और पायलेट्स एक्सपर्ट माना जाता है। वे कैटरीना कैफ, करीना कपूर खान और दीपिका पादुकोण की फिटनेस गुरू हैं। यासमीन कहती है कई महिलाएं दीपिका की तरह एब्स, कैटरीना की तरह पैर और बिपाश जैसे हाथों की बनावट चाहती हैं। बॉलीवुड सितारों का प्रभाव आम लोगों पर हमेशा रहता है और वे उन्हीं की तरह अपना फिगर भी चाहते हैं। यहां लोगों को यह भी समझना चाहिए कि ये सितारे सिर्फ जादू की छड़ी घुमाकर मनचाहा फिगर नहीं पाते, बल्कि इसके लिए कड़ी मेहनत भी करते हैं। यासमीन ने खुद देखा है कि कैटरीना कैफ ने शीला की जवानी या धूम 3 में अपने लुक के लिए कितना पसीना बहाया है।  साथ ही अपनी डाइट का भी पूरा ख्याल रखा है। एक निश्चित फिटनेस लेवल को पाने के लिए यह जरूरी है कि ऐसे लक्ष्य बनाएं जिन्हें आप लंबे समय तक फॉलो कर सकें। यास्मीन की जिम काफी मॉर्डन है, जिसमें फिटनेस से जुड़ी कई आधुनिक मशीनें हैं। बॉडी के हर पार्ट के हिसाब से इन मशीनों को डिजाइन किया गया है। यास्मीन के इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक्ट्रेस की तस्वीरों को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। जरीन खान ने भी अपना वजन यास्मीन की जिम और टिप्स के साथ कम किया था।
फिटनेस मंत्र
किसी की देखादेखी एक्सरसाइज न करें, बल्कि
अपने बॉडी शेप के अनुसार एक्सरसाइज का चयन करें।
डैनी पांडे
जब लोग शेप में आने का सोचते हैं तो सबसे पहले भुखा रहना शुरू कर देते हैं। वे जल्दी रिजल्ट चाहते हैं इसीलिए कई बार फैट को बर्न करने वाले सप्लीमेंट्स लेना शुरू कर देते हैं, लेकिन इससे हमेशा बॉडी को नुकसान ही होता है। इससे अच्छा है हेल्दी डाइट लें और वजन घटाएं। साथ ही जिस तरह से जिंदगी में अपने काम और फायनेंस को संतुलित करना जरूरी है, उसी तरह अपनी भावनाओं को संतुलित रखे। अगर मन आपके काबू में नहीं है तो वजन कम करना मुश्किल है। ये कहना है डैनी पांडे का।  डैनी बिपाशा बसु, कुणाल कपूर, लारा दत्ता और अभय देओल की फिटनेस ट्रेनर हैं।
अनुज राक्यान
अनुज को जूस डिटॉक्स ट्रेंड भारत में लाने का श्रेय दिया जाता है। चेतन भगन और लीसा रे के वे फिटनेस गुरु हैं। खुद अनुज के शब्दों में लगभग दस साल पहले मैं वजन कर करने के लिए हेल्दी डाइट को लेकर कंफ्युज था। तभी मैने ये मेहसूस किया कि ऐसे कई लोग हंै जो हैल्थ और फिटनेस के बारे में यह मानते हैं कि जूस पीने से वजन कम होता है, लेकिन ऐसा नहीं है, अगर आप उसी मात्रा में फल या सब्जियां खाते हैं तो अलग से जूस पीने की जरूरत नहीं है। वैट मेनेजमेंट के लिए विटामिन को सही मात्रा में लेना न भुलें। अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं और साथ ही निश्चित अंतराल के बाद डिटॉक्सिफिकेशन पर ध्यान दें।
फिटनेस मंत्र
अनुशासनबद्घ जीवन शैली अपनाएं और फिट रहें। फिट रहने के लिए जितना जरूरी अच्छी डाइट को अपनाना है उतना ही ध्यान पर्याप्त नींद
लेने पर भी होना चाहिए।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

छोटे शहरों के लाल
करेंगे वल्र्ड कप में कमाल 


इस बार विश्वकप में जिन भारतीय खिलाडिय़ों का चयन हुआ है, उनमें से अधिकांश खिलाड़ी भारत के छोटे
शहरों से हैं। ये वे खिलाड़ी है जिन्होंने पिछले कुछ सालों में क्रिकेट मैचों के दौरान सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर अपनी योग्यता जाहिर की है। एक बार फिर देश की 125 करोड़ जनता की उम्मीदें धोनी और उनकी टीम से हैं। अब देखना यह है कि इस विश्व कप के दौरान अधिकांश छोटे शहरों से आए धुरंधर खिलाड़ी क्या अपने देश को विश्व कप दिला सकेंगे...
झारखण्ड के रांची जैसे छोटे शहर के निवासी महेंद्र सिंह धोनी कभी गेंद पर पूरी ताकत से प्रहार कर उसे सीमा रेखा से बाहर भेजते हुए या कभी विकेट कीपर की सामान्य कद काठी से जुदा अपने गठीले बदन से गेंद की दिशा में छलांग लगाते हुए क्रिकेट मैच के दौरान देखे जाते हैं। कभी अखबार के पन्नों पर छपे विज्ञापनों में तो कभी टेलीविजन स्क्रीन पर धोनी छाए रहते हैं। क्रिकेट की सीमारेखा के आर-पार महेंद्र सिंह धोनी की ये छवियां एक आम भारतीय के मन में कभी ना कभी दस्तक जरूर देती हैं। इस तरह महेंद्र सिंह धोनी बीते एक दशक में भारत के सबसे कामयाब क्रिकेटर रहे हैं। इस एक दशक के दौरान उनका हर अंदाज स्टाइल बन गया। आज भी पार्थिव पटेल,अजय रातरा और दिनेश कार्तिक जैसे युवा दिग्गज खिलाड़ी उन्हीं के दिखाए हुए रस्ते पर चलना पसंद करते हैं।
 2007 में वनडे कॅरियर की शुरुआत करने वाले रोहित गुरुनाथ शर्मा महाराष्टï्र के नागपुर में जन्में है। रोहित उन चुनिंदा खिलाडिय़ों में से हैं, जिनकी तारीफ करने वालों की कमी नहीं है। साथ ही इस विश्व कप में भी उनसे कई आशाएं की जा रही है। उनके खेल के स्टाइल और तकनीक का कमाल यह है कि जब वो 2007-08 में ट्राई सीरीज के लिए ऑस्ट्रेलिया गए थे तो पूर्व क्रिकेटर इयान चैपल ने उन्हें आने वाले दौर में विश्व क्रिकेट का सबसे करिश्माई बल्लेबाज बताया था। कमेंट्री बॉक्स में रमीज राजा से लेकर सुनील गावस्कर तक और ड्रेसिंग रूम में तेंदुलकर से लेकर धोनी इस युवा बल्लेबाज की प्रतिभा का कायल रहा है। मुंबई से अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले रोहित ने वह समय भी देखा है जब उनके पास फीस भरने के पैसे भी नहीं हुआ करते थे। ये रोहित का क्रिकेट के प्रति जूनून ही था कि स्कूल टूर्नामेंट में कई बेहतरीन प्रदर्शन के बाद रोहित को मुंबई अंडर-20 के चुन लिया गया। ये रोहित की योग्यता ही थी कि आईपीएल में डेक्कन चार्जर्स ने रोहित को खिलाने के लिए तीन करोड़ से ज्यादा की बोली लगाई। रोहित की लोकप्रियता का अंदाजा लगाने के लिए ये काफी है लेकिन रोहित की मां और उनके कोच की माने तो इन सब के बावजूद रोहित में कोई बदलाव नहीं आया। आज ऐशो-आराम की जिंदगी जीने के बाद भी अपनी तंगहाली के दिल वे कभी नहीं भुलते।
टीम इंडिया की सनसनी उमेश यादव नागपुर के रहने वाले हैं। कभी खेतों में काम करने वाले उमेश यादव ने क्रिकेट में पदार्पण किया और फिर टीम इंडिया की जरूरत बन गए। उमेश यादव टीम इंडिया के स्ट्राईक गेंदबाज हैं। पिछले एक साल में कप्तान धोनी का भरोसा उन पर बहुत बढ़ा है। टीम इंडिया को इस विश्वकप को जिताने में गेंदबाजों का बहुत अहम रोल होने वाला है। उसमें उमेश यादव की स्टीक लाईन-लेंथ और तेज गेंदबाजी भारत के विश्व कप का सपना पूरा कर सकती है। उमेश यादव टीम इंडिया के ऐसे गेंदबाज है  जिनके नाम वनडे क्रिकेट में 154.8 किमी/प्रतिघंटे की गेंद भी दर्ज है।
कहते हैं प्रतिभाएं जगह की मौहताज नहीं होती। यह बात मोहम्मद शमी के लिए सटीक है।
उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जैसे छोटे से शहर समीप के गांव से निकलकर टीम इंडिया का हिस्सा बने मोहम्मद शमी ने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत की है। शमी के सिर पर क्रिकेट का जुनून इस कदर हावी था कि वह अपने कोच बदरुद्दीन के साथ गांव से ट्रेन में बैठकर मुरादाबाद आते और यहां पर क्रिकेट का अभ्यास करते। जब कोचिंग लेने का समय समाप्त हो जाता तब भी वे नेट्स पर ट्रेनिंग लिया करते थे। बाद में यही कड़ी मेहनत रंग लाई। प्रतिभा होने के बावजूद उन्हें जब उत्तरप्रदेश की टीम में जगह नहीं मिली तो वे अपना भाग्य आजमाने के लिए बंगाल चले गए। उत्तरप्रदेश के क्लबों में उन्होंने जो कुछ सीखा था, उसका असर जल्दी ही दिखने लगा और वे बंगाल की टीम की गेंदबाजी के प्रमुख अस्त्र बन गए।
अपने शहर का नाम आज विश्व भर मे रोशन करने वाले ऐसे ही महान क्रिकेटर हैं सुरेश रैना। उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद में सुरेश रैना का जन्म हुआ और यहीं वे पले-बढ़े। रैना भारत के एक मात्र ऐसे क्रिकेटर हैं जिन्होंने टेस्ट, वनडे और टी-20 में टीम इंडिया की तरफ से शतक ठोका है। इस विश्व कप के लिए रैना कहते हैं यह नया टूर्नामेंट है और हम अच्छे प्रदर्शन को तत्पर हैं। हम जीत के भूखे हैं और विश्व कप से बड़ा कोई टूर्नामेंट नहीं हो सकता। हम पाजीटिव सोच के साथ एक दूसरे के साथ का लुत्फ उठाते हुए मैदान में शानदार प्रदर्शन करेंगे।
गुजरात के नाडियाद का रहने वाला अक्षर पटेल बायें हाथ के एक अच्छे बल्लेबाज के साथ-साथ बायें हाथ के स्पिनर भी हैं। अक्षर को 2013 में आइपीएल की मुंबई इंडियन टीम के लिए चुना गया और 2014 में पंजाब की टीम के लिए उनका चयन हुआ।  इस होनहार खिलाड़ी पर चयनकर्ताओं समेत खुद कप्तान धोनी को काफी भरोसा है।
 मेरठ में रहने वाले भुवनेश्वर कुमार चैंपियंस ट्रॉफी और वेस्टइंडीज में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुके है। सच तो यह है कि भुवनेशवर की कहानी भारत के छोटे शहरों से आने वाले खिलाडिय़ों की कामयाबी जैसी ही है जिनके बारे में यूपी रणजी टीम के बल्लेबाज उमंग शर्मा का कहना है कि वो भले ही मेरा साथी है लेकिन उसने मुझे ये उम्मीद दी है कि मैं भी भारतीय टीम में खेल सकता हूं।
वल्लभगढ़, हरियाणा में जन्में मोहित शर्मा आईपीएल व रणजी ट्राफी में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। वे रणजी ट्राफी में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर इंडिया का लीडिंग विकेट टेकर गेंंदबाज बने और उसके बाद आईपीएल में भी उन्होंने अपनी ओर से उत्कृष्ट प्रदर्शन दिया। गुजरात के जामनगर का प्रतिनिधित्व करते हैं रविंद्र जडेजा।  रविन्द्र जब 17 साल के थे तभी उनकी मां लता बेन का एक सड़क हादसे में निधन हो गया। लता बेन का सपना था की उनका बेटा एक दिन भारतीय क्रिकेट टीम की तरफ से खेले। जिस समय लता बेन का देहांत हुआ उसी दौरान रविन्द्र का चयन अंडर 19 वल्र्ड कप की टीम में हुआ था लेकिन मां के देहांत के बाद रविन्द्र का पूरा ध्यान क्रिकेट से हट गया तब उनकी बड़ी बहन नैना ने याद दिलाया की मां उन्हें भारतीय टीम में देखना चाहती थी। इसके बाद रविन्द्र ने क्रिकेट पर फोकस किया और वह मां के सपने को पूरा करने में सफल हुए।



शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

इश्क हवाओं में है


एक दौर वो था जब लड़का-लड़की को देखता है। एक दो मुलाकातें होती है और प्यार हो जाता है। लड़का उससे शादी की बात करता है और कई बार घरवालों की मर्जी से तो कभी उनके विरोध करने के बावजूद दोनों शादी कर लेते हैं। ये तो रहीं बीते दौर की बातें लेकिन अब जमाना सोशल मीडिया का है। आपको एक दूसरे से मिलने या देखने की जरूरत ही नहीं है। बस फेसबुक पर नैन मिले, व्हाट्सएप पर मैसेज हुए। बात बनीं तो ठीक और न बनीं तो दोनों अपने-अपने रास्ते पर दूसरे साथी की तलाश में फिर इंटरनेट सर्च करने में लग गए। सोशल मीडिया की वजह से इश्क का इजहार करना जितना आसान हुआ उतना ही मुश्किल रिश्तों के स्थायित्व को बनाए रखना भी  है। वेलेंटाइन वीक शुरू हो चुका है और आज है प्रपोज डे। प्यार के लिए बने इस खास दिन में  बात करें ऐसे ही युवाओं की जो इंटरनेट की दुनिया के बीच प्यार की फिजाओं में गुम हैं...

रिचा की मुलाकात अपने फेसबुक फें्रड्स के माध्यम से राहुल से हुई। दोनों ने एक दूसरे को फेसबुक पर देखा और चैटिंग शुरू कर दी। इस बारे में रिचा कहती हैं, सोशल मीडिया की वजह से हमें एक दूसरे को जानने का मौका मिला। हमने कभी एक दूसरे से मोबाइल पर बात नहीं की और न ही कभी मिलने की जरूरत महसूस हुई। बस फेसबुक पर बातें होती रही। फिर एक दिन राहुल ने फेसबुक पर मुझे प्रपोज करते हुए पूछा -क्या तुम मुझसे शादी करोगी? इससे पहले राहुल से होने वाली बात उसकी ओर मुझे खींचती रही और तभी मैंने सोच लिया था कि इससे अच्छा जीवन साथी मुझे दूसरा नहीं मिल सकता। मैंने इंस्टाग्राम पर उसकी तस्वीरें पोस्ट करके अपने दोस्तों से उनकी राय मांगी और दोस्तों की राय जानने के बाद राहुल को हां कर दी। प्रपोज करने का ये वही ट्रेंड है जो पिछले कुछ सालों से युवाओं के बीच चलन में है। सोशल मीडिया और यू ट्यूब की वजह से प्यार का इजहार करने वाले पल अब निजी न होकर सार्वजनिक हो गए हैं, जिन्हें दो प्यार करने वालों के साथ-साथ उनके अन्य दोस्त भी सोशल मीडिया पर जानते हैं।
सिर्फ एक बटन दबाते हुए दिल से निकले हर शब्द आपके प्यार के गवाह बन जाते हैं। सोशल मीडिया पर अपने प्यार का इजहार करने वाले युवाओं का उत्साह देखते ही बनता है। 2012 में मेन्स हेल्थ पत्रिका द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 30 प्रतिशत लड़कियां मोबाइल पर दोस्तों को मैसेज और ई मेल करने से पहले अपनी सगाई की तस्वीरें और रिलेशनशिप स्टेटस को फेसबुक पर बदलती हैं। खास बात तो यह है कि लड़कों की तरह लड़कियां भी प्यार को दिल से लगाकर बैठने के बजाय इसे एंज्वॉयमेंट या फन का नाम देना पसंद करती हैं। 28 वर्षीय आर्यन दो साल से जिस लड़की के साथ लव रिलेशनशिप में है, उसके साथ फेसबुक पर हुई हर बात को हमेशा संजोकर रखना चाहते हैं, ताकि जीवन भर जब भी अपने पहले प्यार को याद करें तो इन्हें देख सकें। उन्होंने अपने दोस्तों और घर वालों के लिए यू ट्यूब पर 22 मिनट की मिनी मूवी बनाई है। इस बारे में आर्यन का कहना है कि मुझे लोगों को सरप्राइज देना पसंद है। इस बार वेलेंटाइन डे पर
इससे अच्छा सरप्राइज और क्या हो सकता है।
अगर सरप्राइज की ही बात करें तो अपने लव प्रपोजल को ट्विटर पर व्यक्त करना इस वजह से भी अच्छा है, क्योंकि आपके दोस्तों की भारी भीड़ ट्विटर पर कम होती है। 140 शब्दों में मन की बात ट्विटर के माध्यम से कहना आपके पार्टनर को यकीनन पसंद आएगा। अच्छा तो यह होगा कि आप अपने साथी के साथ बात करके ट्विटर का टाइम तय कर लें ताकि जब आप दोनों के पास वक्त हो उसी समय ट्विटर पर आसानी से बात हो सके । प्यार के दीवाने ऐसे युवाओं की भी कमी नहीं जो दिन भर चाहे कितने ही व्यस्त क्यों न हो, लेकिन दिन में एक बार सोशल मीडिया पर हुए सारे अपडेट चेक करने का वक्त निकाल ही लेते हैं। फिर चाहे ट्विटर हो या इंस्टाग्राम जिसकी वजह से अब तक न जाने कितने दिल एक हुए हैं। इंस्टाग्राम सहित कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स सरहद की दीवार तोड़कर युवाओं को एक कर देती हैं। इस बारे में 26 वर्षीय श्रेया कहती हैं मैंने इंस्टाग्राम पर अपनी एक फोटो पोस्ट की। साथ ही एक कमेंट लिखा-मैं ऐसे जीवनसाथी को ढूंढ रही हूं, जिसकी पसंद और नापसंद मुझसे मिलती हो। अगर आप मेरी फोटो को पसंद करते हैं और मेरे बारे में अधिक जानना चाहते हैं तो मुझसे दोस्ती करें। इसे पढ़कर अमेरिका की मल्टीनेशनल कंपनी मेें कार्यरत शांतनु ने भी अपनी फोटो इंस्टाग्राम पर अपलोड की। साथ ही मुझे दोस्ती का प्रपोजल भी दिया। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला। दुनिया भर के दीवानों को एक दूजे के करीब लाने और मिलने-मिलाने का मौका इंटरनेट की वजह से जिस तरह पिछले कुछ सालों से हो रहा है, ऐसा पहले कभी न था। इससे जहां नए रिश्तों में नजदीकियां बढ़ती हैं वही पुराने रिश्ते या बरसों से एक दूजे से न मिलने वाले प्रेमी भी फिर से एक डोर में बंध जाते हैं। सोशल मीडिया द्वारा अपने दिल की हर बात एक क्लिक के साथ ही अपने पार्टनर तक पहुंचाते हैं और चंद मिनटों में
उनकी प्रतिक्रिया जान भी जाते हैं। शायद इसी वजह से मोबाइल पर लंबी बात करना युवाओं को कई बार रास नहीं आता। प्यार के लेटेस्ट इंटरनेट ट्रेंड को अपनाने से पहले ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि आपकी हंसी, खुशी, उदासी, गुस्सा या फिर छेड़छाड़ यहां सिर्फ शब्दों के माध्यम से बयां होती है इसलिए मैसेज करने से पहले सिर्फ दिल का ही नहीं बल्कि दिमाग का भी इस्तेमाल करें ताकि प्यार का सागर नेट के माध्यम से ही सही पर गहरा होता रहे।
उम्मीद की शमा जलती रहे
 
 जीवन और मौत के बीच जब फासला कम हो रहा हो तो जीवन को जीने और समझने का नजरिया बदल जाता है। ऐसे मुश्किल समय में किताबें प्रेरणा बनकर हमारे साथ होती है। शायद इस बात को समझते हुए कैंसर का सामना कर रही महान हस्तियों ने अपने अनुभवों को किताबों के माध्यम से पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है। उनकी ये किताबें कैंसर के मरीजों की जिंदगी में उम्मीद की किरण के समान है। आज यही किताबें कैंसर का मुकाबला कर रहे लाखों मरीजों की जिंदगी में उम्मीद की शमा जलाए हुए हैं...

साइकिलिस्ट लांस आर्मस्ट्रांग की किताब इट्स नॉट अबाउट द बाइक -माई जर्नी बैक टू लाइफ कभी कैंसर के मरीज रहे क्रिकेटर युवराज सिंह को जीवन में आगे बढऩे के लिए प्रेरित करती है। हॉकी खिलाड़ी जुगराज सिंह ने भी वर्ष २००३ में सड़क दुर्घटना के बाद इसी किताब को पढ़ा था। इस किताब में आखिर ऐसा क्या है कि कोई भी खिलाड़ी मुश्किल वक्त में इसे जरूर पढ़ता है। यह किताब दरअसल जिंदगी की चुनौतियों से लडऩा सिखाती है। लांस आर्मस्ट्रांग की भाषा में कहें, तो दर्द अस्थायी होता है, जो एक मिनट, एक दिन, एक घंटे या फिर एक साल तक आपको परेशान कर सकता है, पर उस दर्द की वजह से अगर आप मैदान छोड़ दें, तो उसकी पीड़ा ताउम्र सताती है।
शायद कम ही लोग जानते होंगे कि जब लांस ऑर्मस्ट्रांग की च्कीमोथेरेपीज् चल रही थी, तब भी उन्होंने अपना अभ्यास नहीं छोड़ा था। कैंसर की विकसित स्टेज को खुद में पाले रहने के बाद भी आर्मस्ट्रांग को रेसिंग ट्रैक ही नजर आता था। हां, एक वक्त ऐसा जरूर आया, जब उन्हें लगा कि शायद उन्हें साइकिलिंग छोडऩी होगी, पर ऐसे मुश्किल वक्त में ऑर्मस्ट्रांग खुद ही अपनी प्रेरणा बन गए। यह किताब इतनी लोकप्रिय इसीलिए भी हुई, क्योंकि इसमें लोगों को अपनी बीमारी से जूझने के लिए च्मेडिकलीज् कोई मदद भले न मिली हो, पर च्मेंटलीज् काफी मदद मिली। आम तौर पर खिलाड़ी अपनी चोट व बीमारी को छिपाते हैं। वे खुद को कमजोर व लाचार कभी नहीं पेश करना चाहते हैं लेकिन ऑर्मस्ट्रांग जब अपनी बीमारी का जिक्र करते हैं, तो बिल्कुल आम इंसान बन जाते हैं। आर्मस्ट्रांग ने जब कैंसर की लड़ाई जीतने के बाद दोबारा च्टूर द फ्रांसज् में हिस्सा लिया, तो पहले से ज्यादा बेहतर च्टाइमिंगज् और बेहतर रिकॉर्ड के साथ जीत हासिल की। यह रेस दुनिया के सबसे कठिन खेलों में शुमार है। करीब तीन हफ्ते तक चलने वाली इस रेस के दौरान उन्हें ऊंचे-नीचे और पहाड़ी रास्तों से गुजरना होता है। यही खासियत है, जो मुश्किलों से जूझ रहे खिलाडिय़ों को अपने अंदर छिपे च्चैंपियनज् को दोबारा ढूढऩे के लिए प्रेरित करती है। लांस ने कैंसर जैसी बीमारी से लडऩे के बाद इस किताब को लिखकर लोगों को जिस तरह से प्रेरणा दी है उसी की वजह से उनके बाद भी कैंसर के कई रोगियों ने किताबों के माध्यम से इस बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
टाइम मैगजीन के पूर्व मैनेजिंग एडीटर वाल्टर इसाकसन ने स्टीव जॉब्स की आत्मकथा लिखने से पहले बैंजामिन फ्रेंकलिन और हेनरी किसिंगर की आत्मकथा लिखी थी। ६५६ पन्नों की स्टीव जॉब्स की आत्मकथा में उन्होंने स्टीव के कैंसर से जुझते हुए अंतिम दिनों को संजोया है। इसाकसन ने लिखा है कि २००४ में जब एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स को कैंसर का पता चला तो डॉक्टर द्वारा दी गई ऑपरेशन की सलाह को मानने के बजाय उन्होंने माइक्राबायोटिक डाइट से अपनी बिमारी को नियंत्रित करना चाहा। मरने से पहले उन्हें इस बात का पछतावा भी रहा कि वक्त रहते उन्होंने डॉक्टर की सलाह क्यों नहीं मानी। इसाकसन ने जॉब्स के लगभग २० इंटरव्यू लिए और उसके बाद उनके परिचितों, दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों से बात करके उनकी बॉयोग्राफी लिखी। एक बार वाल्टर ने जॉब्स से पूछा कि आपने ऑपरेशन क्यों नहीं करवाया तो उनका जवाब था कि मैं नहीं चाहता था कि मेरे शरीर को खोला जाए। अंत में जब जॉब्स का ऑपरेशन हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि कैंसर उनके पूरे शरीर में फैल चुका था। जीवन और मौत के बीच जब फासला कम हो रहा हो तो जीवन को जीने और समझने का नजरिया बदल जाता है। क्रिकेटर युवराज सिंह ने अपने हौसलों से न सिर्फ कैंसर से अपनी जंग में जीत हासिल की, बल्कि मैदान में वापसी भी करके दिखाया। अपनी बीमारी को छुपाकर रखने वाले अन्य सेलिब्रिटीज से इतर युवराज ने अपनी किताब च्द टेस्ट ऑफ माई लाइफ-फ्रॉम क्रिकेट टू कैंसर एंड बैकज् में अपने जीवन को खुलकर शेयर किया। अपनी किताब में वे लिखते हैं, च्एक खिलाड़ी के तौर पर हमें दर्द सहना सिखाया जाता है। हम शरीर का प्रशिक्षण और पोषण इस तरह करते हैं कि दिमाग तन की चिंता से मुक्त रह सके।ज् मेडियास्टिनल सेमिनोमा के लिए कीमोथेरेपी कराने के दौरान युवराज ने यह फैसला किया कि वे कीमो के दौरान अपने शरीर की प्रतिक्रिया को नियमित ट्विटर पर शेयर करेंगे। इसके लिए उन्होंने वीडियो डायरी भी बनाई। अपने बाल उडऩे, खाना न पचने संबंधी तमाम बातों और दवा के असर को लोगों से शेयर किया। तब से अब तक यूवीकेन ट्रस्ट के जरिए वे कैंसर पीडि़तों के लिए काम कर रहे हैं।
मॉडल से अभिनेत्री बनी लीसा रे को नूसरत फतेह अली खां के एलबम आफरीन आफरीन से प्रसिद्धि मिली। २००९ में उन्हें मल्टीपल मायलोमा से ग्रस्त पाया गया। दस महीने बाद ही उन्होंने खुद को इस बीमारी से स्टेम सेल ट्रांसप्लांट द्वारा ठीक कर लिया। इस बीमारी से उबरने के बाद लीसा रे ने जेसोन देहनी से विवाह कर ये साबित किया कि कैंसर के मरीज भी सामान्य जीवन जी सकते हैं। आज वे अपने ब्लॉग द यलो डायरीज के माध्यम से कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए लिखती हैं। उनका कहना है कि इस बीमारी से ग्रस्त मरीजों के लिए बीमारी पर होने वाले खर्च और आम लोगों के बीच जिंदगी की जददेजहद तो मुश्किल है ही साथ ही शारीरिक कमजोरी से जूझ पाना भी तकलीफदायक होता है। ऐसे में जो मरीज कैंसर के नाम से घबराकर जिंदगी से हार मान लेते हैं, उनके लिए मैं काम रही हूं। मैंने दिल्ली स्थित शिलादित्य सेनगुप्ता की संस्था के साथ काम करना शुरू किया जो कैंसर के मरीजों के मदद करते हैं। लीजा ने कॉकटेल डिजाइनर साड़ी लाइन की शुरूआत की है जिससे मिलने वाली सारी रकम वे कैंसर पेशेंट्स की मदद करने में देती हैं।

कैंसर के उपचार के दौरान मुझे लांस आर्मस्ट्रॉन्ग से काफी प्रेरणा मिलती थी। उन्हें भी वही कैंसर था, जो मुझे था। तब लगा कि मुझे भी किताब लिखना चाहिए जो दूसरे लोगों के लिए प्रेरक हो सकती है। शुरुआत में दूसरे सेलिब्रिटी की तरह मैं भी लोगों के सामने नहीं आना चाहता था, पर जब स्थिति को स्वीकार कर लिया, तब लगा कि मुझे ऐसा करना चाहिए, जो अन्य लोगों को अपनी लड़ाई लडऩे में मदद करे। तभी मैंने किताब लिखने का निर्णय लिया।
 च्द टेस्ट ऑफ माई लाइफ फ्रॉम क्रिकेट टू कैंसर एंड बैकज् का एक अंश

शनिवार, 20 सितंबर 2014

जोशीले जीनियस 

 

ऐसे कई लोग हैं, जिनमें योग्यता की कमी नहीं है। साथ ही ऐसे लोगों की संख्या भी अधिक है, जिन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद भी अन्य प्रोफेशन में ऊंचा नाम हासिल किया। अपना शौक पूरा करने की धुन उन्हें इस मुकाम पर ले आई, जहां आज उनकी डिग्री के बारे में कोई बात भी नहीं करता। 
सपने वे नहीं होते, जो आपको रात में सोते समय नींद में आएं। बल्कि सपने वे होते हैं, जो रात में सोने न दें। ऐसी बुलंद सोच रखने वाले मिसाइल मैन, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और भारत रत्न से सम्मानित एपीजे अब्दुल कलाम ने जब देश के सर्वोच्च पद यानी 11वें राष्ट्रपति की शपथ ली तो हर वैज्ञानिक का सिर गर्व से ऊंचा हो गया। मिसाइल मैन के नाम से जाने जाने वाले कलाम भारतीय मिसाइल प्रोग्राम के जनक कहे जाते हैं। एयरोनॉटिकल इंजीनियर कलाम अपनी पांचवीं कक्षा के अध्यापक सुब्रह्मण्यम अय्यर से प्रभावित थे।
राजनैतिक अखाड़े में चाणक्य कहे जाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पटना से अभियांत्रिकी में स्नातक की डिग्री ली। अन्य राजनीतिक पार्टियां जहां जातपांत की रोटी सेंकने में व्यस्त रहीं, वहीं सोशल इंजीनियरिंग के जादूगर नीतीश कुमार के राजनैतिक दांवपेंच किसी से छिपे हुए नहीं हैं।
सुपरमॉडल सिंडी क्राफोर्ड को मॉडलिंग की दुनिया इतनी रास आई, जिसके चलते उन्होंने अपनी पढ़ाई से किनारा कर लिया। सिंडी ने नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी से केमिकल इंजीनियरिंग में एडमीशन लिया। कॉलेज में उन्होंने कुछ सेमेस्टर भी अटैंड किए, लेकिन मॉडलिंग के लिए अवसर मिलते ही उन्होंने इंजीनिरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ दी और माडलिंग जगत में अपनी वो पहचान बनाई, जिसके चलते उम्र के पचास साल पूरे होने के बाद भी वे सुपर मॉडल के तौर पर छाई हुई हैं। इन हस्तियों ने पढ़ाई के शुरुआती दिनों में कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन अपनी डिग्री से अलग वे देश-दुनिया में शोहरत हासिल करेंगे।  चेतन भगत ने 1991-95 में मैकेनिकल इंजीनिरिंग की डिग्री दिल्ली से ली थी। कौन जानता था कि इस क्षेत्र से अलग चेतन एक लेखक के रूप में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के युवाओं के प्रेरणास्रोत साबित होंगे। उनके उपन्यास द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ और फाइव पॉइंट समवन से वे दुनिया में छा गए। आज हालत यह है कि बाजार में आने से पहले ही उनकी नई किताब का लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इन दिनों यही उत्सुकता उनकी दो महीने बाद प्रकाशित होने वाली किताब हाफ गर्लफें्रड को लेकर बनी हुई है।
चर्चित टीवी धारावाहिक 'पवित्र रिश्ताÓ में मानव के किरदार ने सुशांत राजपूत को हर घर में लोकप्रियता दिलाई, लेकिन उन्होंने छोटे पर्दे को अलविदा कह अभिषेक कपूर की फिल्म से बॉलीवुड में पदार्पण किया। अभिनय का चस्का सुशांत पर इतना हावी था, जिसके चलते उन्होंने अपने शानदार कॅरियर को छोड़ दिया। सुशांत ने आल इंडिया इंजीनियरिंग इंट्रेंस एक्जाम में सातवीं रैंक हासिल की और दिल्ली के कॉलेज में एडमीशन लिया। फिजिक्स में वे नेशनल ओलंपियाड विनर रहे हैं। सुशांत ने 11 नेशनल इंजीनियरिंग एक्जाम क्लीयर किए, जिसमें धनबाद का नेशनल माइंस भी शामिल है। लेकिन एक हीरो के रूप में छा जाने की धुन के चलते उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। खुद सुशांत के शब्दों में फिल्मों में आने की मेरी पहले से कोई योजना नहीं थी और न ही मैं यहां पैसा या फिर लोकप्रियता के लिए आया हूं। मुझे स्टारडम समझ नहीं आता और न ही मैं स्टार बनना चाहता हूं। हां, मैं नंबर एक अभिनेता जरूर बनना चाहता हूं। मेरा मकसद हमेशा खुद को एक अभिनेता के तौर पर उभारना है। सुशांत खुद भी मानते हैं कि उनके जीवन का ये बहुत ही रोमांचक दौर है। पिछले कुछ सालों से राजनैतिक गलियारों में चर्चित अरविंद केजरीवाल ने आईआईटी खडग़पुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और वे 1992 में भारतीय राजस्व सेवा में शामिल हुए। 2006 में जब वे आयकर विभाग में संयुक्त आयुक्त थे, तब उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सूचना का अधिकार देने का कानून बनवाया। वे एक एनजीओ (साथी) से भी जुड़े हुए हैं। केजरीवाल ने पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन नाम का एक गैर-सरकारी संगठन भी बनाया है। उन्होंने जन लोकपाल बिल के लिए अन्ना हजारे के साथ मिलकर अनशन किया और धरनों, प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। नवंबर, 2012 में उन्होंने आम आदमी पार्टी की शुरुआत की, जो आज भी राजनीति में सक्रिय है।
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं। अखिलेश ने इंजीनियरिंग करने के बाद मैसूर यूनिवर्सिटी से एन्वॉयरमेंट इंजीनियरिंग की मास्टर्स डिग्री ली। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी से भी इसी विषय में मास्टर्स डिग्री प्राप्त की है।
इंजीनियर्स ने अपने हुनर खेल के मैदान में भी बखूबी दिखाए। भारत की ओर से पांच सौ विकेट लेने वाले पहले खिलाड़ी अनिल कुंबले ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इंजीनियर्स की फेहरिस्त में श्रीसंत भी शामिल हैं। आखिरी ओवरों में पसीने से तर-बतर गेंदों पर नियंत्रण करने की कोशिश करने वाले श्रीसंत सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। ये वही श्रीसंत हैं, जो आखिरी मौके तक दम लगा देने वाले खिलाड़ी के तौर पर जाने जाते हैं। 
मेरा सहारा तू ही तू

दुनिया में जब सारे सहारे दूर हो जाते हैं, तब आध्यात्म ही वह सहारा होता है, जो संबल बनकर हमारे साथ रहता है। इसके महत्व को जानते हुए हमारे देश के अलावा विदेशियों ने भी ये मान लिया है कि आध्यात्म ही हर समस्या का समाधान है।


रामभांड, यह नाम उस शख्स का है, जिसने आध्यात्म के लिए इंग्लैंड को छोड़कर भारत आना पसंद किया, वह भी उन परिस्थितियों में, जबकि परिवार इस फैसले में उनके साथ नहीं था। राम, किसी भी स्थापित आध्यात्मिक संत की तरह परिधान नहीं धारण करते, ना ही आध्यात्म उनके लिए एकांत या पहाड़ों में खोजने का ज्ञान है।
वे जिस आध्यात्म को जानते हैं, उसे पाने के लिए किसी भी तरह के त्याग की सलाह भी नहीं देते। मुंबई से प्रोडक्शन इंजीनियरिंग, फिर इंग्लैंड का सफर और फिर तेरह साल वहां रहने के बाद मात्र आध्यात्मिक सुख के लिए भारत की मिट्टी को अपनाने का विचार कोई विरला ही कर सकता है। खुद रामभांड के शब्दों में संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा मेरे मन में हमेशा रही, लेकिन इसे मैं आध्यात्म के प्रति रुचि होने का कारण कम मानता हूं। मैं अपने आध्यात्म के प्रति रुझान का पूरा श्रेय इसके सहारे सफलता मिलने को देता हूं।
स्प्रिचुअल्टी कैन ब्रिंग सोशल चेंजेज यानी अध्यात्म से सामाजिक बदलाव हो सकता है। यह कहना है, आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का। उनके अनुसार महात्मा गांधी बड़े आध्यात्मिक व्यक्ति थे। वे रोज बैठकर सत्संग किया करते थे। सबको सम्मति दे भगवान वो गाते थे। उसकी वजह से ही लोग जगह-जगह उनसे जुडऩे लगे और एक बड़ा आंदोलन शुरू हो गया। आध्यात्म में वो शक्ति है, जो प्रेरणादायी बनकर हमारे साथ रहती है। आदित्य बिड़ला ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन फॉर एजूकेशन प्रोजेक्ट्स नीरजा बिड़ला के शब्दों में मैं अपने एक्सपीरियंस से यही कह सकती हूं कि आध्यात्म के सहारे हम अपने काम को मन लगाकर करते हैं और फल की चिंता ईश्वर पर छोड़ देते हैं। आज हर व्यक्ति की सफ लता के लिए आध्यात्म बेहतरीन जरिया साबित हो सकता है। मेरा मानना है कि हर काम में अपना बेस्ट दो और फिर भगवान पर छोड़ दो। आपकी मेहनत के अनुसार भगवान आपको फल जरूर देंगे।
आध्यात्म के मायने हर व्यक्ति के लिए अलग हैं। अगर कोई इसमें अपने काम की सफलता देखता है तो कोई इसे परमेशवर की भक्ति में लीन होना मानता है। संगीतकार एआर रहमान मानते हैं कि उनका संगीत आध्यात्म से जुड़ा है और सूफी शैली ने उन्हें बहुत प्रभावित किया है। उनके अनुसार सूफी शैली इस्लाम का एक आध्यात्मिक अंग है, जो अपार प्रेम और सर्वव्यापकता से जुड़ा है। वे इससे बहुत प्रभावित हैं। ऑस्कर पुरस्कार जीत चुके रहमान ने ऑस्कर समारोह में कहा था कि उनके पास प्यार और नफरत में से एक को चुनने का विकल्प था और उन्होंने प्यार को चुना। खुद उनके शब्दों में मेरे जीवन में बहुत नकारात्मक चीजें सामने आती रहती हैं, लेकिन मैंने फैसला किया है कि मैं सकारात्मक रवैया रखूंगा।
इतनी सफलता मिलने के बाद भी रहमान काफी नम्र दिखते हैं। इस तरह के व्यक्तित्व के पीछे कारण बताते हुए वे कहते हैं, मैं एक दक्षिण भारतीय हूं और दक्षिण भारतीय बहुत सीधे-सादे लोग होते हैं। फिर मैं सूफियाना शैली से भी बहुत प्रभावित हूं, जो प्रेम और करुणा पर आधारित है। दूसरों के प्रति प्रेम का भाव मुझे आध्यात्म से जोड़े रखता है। आध्यात्म की शक्ति को देखते हुए मनीषा कोइराला ने उन दिनों इस राह पर चलना स्वीकार किया, जब वे दांपत्य संबंध में मुश्किलों का सामना कर रही थीं। अपने गम को दूर करने के लिए पहले उन्होंने शराब का सहारा लिया, लेकिन जब इससे भी वो गम भुला नहीं पाईं तो उन्होंने आध्यात्म का सहारा लिया। उन्हें विंध्यांचल में विंध्वासिनी मंदिर में समय बिताते हुए देखा जाता है। उन्होंने चे न्नई से 80 किलोमीटर दूर आध्यात्म विश्वविद्यालय में कुछ समय भी बिताया है। परेशानियों से घिर जाने के बाद जब कोई हल सामने नहीं होता तो आम व्यक्ति ही क्या मशहूर हस्तियां भी ईश्वर के सामने नतमस्तक हो जाती हैं। ऐसा ही कुछ पॉप सिंगर ऊषा उथुप के साथ उस समय हुआ, जब एक अपार्टमेंट की लिफ्ट में फंस गई थीं। ऊषा ने बीस साल की उम्र से एक नाइट क्लब में गाने की शुरुआत की। वे कहती हैं, एक बार लिफ्ट का दरवाजा बंद तो हुआ, लेकिन लिफ्ट नहीं चली। मैंने सारे बटन दबाए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। तभी मेरे मन में बुरे-बुरे ख्याल आने लगे। मैं लिफ्ट में अकेली थी और बार-बार यह लग रहा था कि कहीं ये लिफ्ट मेरे सिर पर न गिर जाए। मैंने तुरंत भगवान को याद करना शुरू किया। कुछ देर बाद लिफ्ट चली और जब मैं लिफ्ट से बाहर निकली तो मैंने देखा वहां लोगों की भीड़ लगी थी और वे सभी मेरे लिए प्रार्थना कर रहे थे। तभी मुझे अहसास हुआ कि भगवान उस बुरे वक्त में मेरे साथ थे और उन्होंने मेरी मदद करके मुझे बचाया।
आध्यात्म को पहचानते हुए अब हमारे देश के अलावा विदेशी भी इस शक्ति के प्रति आकृष्ट हो रहे हैं। मॉडल, हॉलीवुड अभिनेत्री और फिल्म निर्माता डेमी मूर और उनके पति कचर छह साल के विवाह के बाद 2011 में एक-दूसरे से अलग हो गए। तब मूर ने अपने अन्दर की नकारात्मकता को खत्म करने और मानसिक शांति पाने के लिए मेक्सिको के ज्योतिष और परामर्शदाता पेद्दी मूर की मदद ली। मूर मानती हैं कि मन की शांति हर व्यक्ति के लिए सबसे जरूरी होती है और जहां भी हमें शांति मिलती है, हम वहीं रुक जाते हैं। ऐसा ही कुछ आध्यात्म के साथ भी है। इसे पाने के लिए ही श्रद्धालु पवित्र स्थानों में कभी नंगे पैर तो कभी भूखे-प्यासे शीष झुकाने के लिए पहुंच ही जाते हैं, जहां ईश्वर के सामने नतमस्तक होकर वह दुनिया की हर समस्या का समाधान पा जाते हैं।
युवाओं की प्रेरणा बना आध्यात्म विज्ञान
प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है एवं विज्ञान के बिना धर्म अंधा है। आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत पर आज भी खोज जारी है। सच तो यह है कि सदियों से चली आ रही साधु-संतों के अध्यात्म की ताकत विज्ञान भी पहचानने लगा है। वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि कई खोजें जो विज्ञान में अब तक हुई हैं, धर्म के अनुयाइयों ने सदियों पहले उनकी भविष्यवाणी कर दी थी। दरअसल आध्यात्म विज्ञान एक मूल विज्ञान है, जिसे पूर्ण ज्ञान माना जाता है, क्योंकि जब तक किसी कार्य या ज्ञान के माध्यम से हम ईश्वर तक न पहुंचें, तब तक ज्ञान अधूरा रहता है और अधूरा ज्ञान हमेशा घातक होता है।